‘शिक्षा का स्तर बढ़ने पर ही जातियों का उत्थान संभव’

दो दिवसीय संगोष्ठी में जातीय प्रगति पर हुआ विमर्ष
अजमेर। महर्षि दयानन्द सरस्वती विष्वविद्यालय में पृथ्वीराज चैहान ऐतिहासिक एवं सांस्कृतिक शोध केन्द्र तथा अखिल भारतीय संस्कृति समन्वय संस्थान जयपुर के संयुक्त तत्वावधान में आयोजित इतिहास में गुर्जर समाज: पुनरावलोकन विषयक संगोष्ठी में विभिन्न वक्ताओं व शोधार्थियों के शोध पत्र से यह निष्कर्ष समाने आया की जातियों के उत्थान के लिए षिक्षा का स्तर बढ़ाना जरूरी है। जिन जातियों के पास षिक्षा का अभाव है व ज्ञान की अल्पता है उनका इतिहास भी अस्त-व्यस्त रुप में संकलित है। ज्ञान के अभाव में इस इतिहास का सही लेखन भी नहीं हो पा रहा है। समय काल और परिस्थिति से जातियों की समृद्धि में भी परिवर्तन हुआ है। रविवार को दो दिवसीय राष्ट्रीय संगोष्ठी का समापन समारोह विष्वविद्यालय के स्वराज सभागार में आयोजित किया गया। समापन समारोह के मुख्य अतिथि अखिल भारतीय विधि एवं निधि प्रमुख धर्मजागरण समन्वय केन्द्र जयपुर के रामप्रसाद ने कहा की समाज व जाति चिंतन राष्ट्रीयव्यापी होना चाहिए। जातियों की प्रगति में षिक्षा का महत्वपूर्ण योगदान होता है। अतः लोगों की विचार धारा में परिवर्तन होना वर्तमान की महत्वपूर्ण आवष्यकता है। जातियों का इतिहास इंटरनेट व पुस्तकों से ज्यादा वंषावलियों में सुरक्षित है। वंषावलियों का इतिहास किसी एक व्यक्ति का विचार या तथ्य संकलन मात्र नहीं है। यह वंषावली लेखन पीढ़ी दर पीढ़ी लिखा गया सामूहिक इतिहास हैै। उन्होंने कहा कि नई पीढ़ी के मार्ग दर्षन के लिए वंषावलियों के पृष्ठों को खंगालना जरूरी है। मुख्य वक्ता सांस्कृतिक प्रवाह पत्रिका के मुख्य संपादक रामस्वरूप अग्रवाल ने कहा की गुर्जर समाज के संगठन के लिए हर प्रयास करना होगा। उŸार से दक्षिण तक गुर्जर समाज को पुनः एक सूत्र में पिरोना होगा। समारोह की अध्यक्षता कर रहे म.द.स.विवि के कुलपति प्रो. भगीरथ सिंह ने अपने उद्बोधन में कहा कि गुर्जर समाज एक प्रतिष्ठित जाति है जो प्राचीन काल में राज व्यवस्था का भी हिस्सा रही है। विदेषी आक्रान्ताओं के कारण इनका धर्मान्तरण व बिखराव हुआ है जिसके परिणाम स्वरूप समाज के समाने आज भी इनका धुंधला इतिहास प्रस्तुत किया जा रहा है। उन्होंने कहा कि लोक संस्कृति की इस जाति को भारतीय संस्कृति का अंग बनाने का प्रयास होना चाहिए। जातियों के विस्तार व इतिहास के लिए समृद्ध ज्ञान का होना भी प्राथमिक आवष्यकता है। संगोष्ठी निदेषक प्रो. षिवदयालसिंह ने संगोष्ठी प्रतिवेदन प्रस्तुत किया तथा मुख्य अतिथियों को श्रीफल भेंट कर व शाॅल ओढ़ाकर सम्मान किया इसी क्रम में प्रो. बी.पी सारस्वत, प्रो. आषीष भटनागर, प्रो. सुभाष चन्द्र, डाॅ. सूरलमल राव, डाॅ. राजू शर्मा, प्रो. अरविन्द पारीक, प्रो. प्रवीण माथुर, प्रो. लक्ष्मी ठाकुर ने अतिथियों का पुष्पगुच्छ भेंट कर स्वागत किया। समारोह का संचालन प्रो. ऋतु माथुर ने किया तथा धन्यवाद अखिल भारतीय संस्कृति समन्वय संस्थान के राष्ट्रीय महासचिव आषुतोष पंत ने ज्ञापित किया।
इस से पूर्व संगोष्ठी के दो तकनीकी सत्रों का आयोजन किया गया। प्रथम तकनीकी सत्र गुर्जर समाज के आस्था केन्द्र एवं वंषावलियाँ विषय पर आधारित था। इस सत्र के मुख्य वक्ता वंषावली लेखक सरदार सिंह राव थे। जिन्होंने अपने संबोधन में गुर्जरों की 300 गौत्रों का उल्लेख किया तथा गुर्जर गौ पालक जाति बताया। इस सत्र की अध्यक्षता राजस्थान वंषावली अकादमी जयपुर के राव महेन्द्रसिंह बोरज ने की तथा सह सत्राध्यक्ष ईषम सिंह चैहान थे।
द्वितीय तकनीकी सत्र गुर्जर समाज का ऐतिहासिक अध्ययन: बिखराव चुनौतियाँ एवं संभावनाएँ विषय आधारित था। इस सत्र की अध्यक्षता गोविन्द गुरु जनजातीय विष्वविद्यालय के कुलपति प्रो. कैलाष सोडानी ने की। सोडानी ने अपने उद्बोधन में कहा की समाज को समरसता के साथ षिक्षा से भी जोड़ना चाहिए। आज ज्ञान का हर क्षेत्र में बोल बाला है। ज्ञान के माध्यम से आपसी भाई चारे के साथ संसार को जीता जा सकता है जो तलवार की ताकत से संभाव नहीं है। दोनों तकनीकी सत्र में सात शोधार्थियों ने शोध पत्र प्रस्तुत किए। सत्रों का संचालन प्रो. ऋतु ने किया।
शोध पत्रिका का विमोचन
इस मौके पर सामाजिक एवं सांस्कृतिक समन्वय के लिए समर्पित द्वि भाषा में प्रकाषित शोध पत्रिका सांस्कृतिक प्रवाह का विमोचन अखिल भारतीय संस्कृति समन्वय संस्थान के प्रधान शरदराव ढ़ोले के द्वारा किया तथा शोध पत्रिका की महत्ता पर प्रकाष डाला। इस पत्रिका में सामाजिक व सांस्कृतिक सहित अनेक तात्कालिक विषयों पर आलेखों का समावेष किया गया है।


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