लहू की कहानी गीतों में …सैकड़ों आदिवासियों के कत्ल की सच्ची कहानी

गौरव अग्रवाल की रिपोर्ट
सिरोही। इतिहासकारों की कलम इस कत्ले आम को नहीं लिख पाई। मगर सच यही है कि वन को बचाने की खातिर वनवासियों ने अपने लहू की नदियां बहा दी। इस जमीन में अपने वीर पूर्वजों के लहू को आज की नस्लें गीतों में गुनगुनाती है। इतिहासकारों ने भले ही इस जमीन में खेली गई खूनी होली को न लिखा हो लेकिन गांव के बुजूर्गो से लेकर युवाओं तक को आज भी वो मंजर याद है।
बेगार यानी काम तो करो लेकिन मेहनताना नहीं। इस प्रथा के बोझ तले दबे वनवासियों पर रजवाड़ों ने भारी लगान का बोझ भी लाद दिया। बगावतें शुरू हुई। जब देशी रजवाड़ों को लगा कि मुकाबला नहीं कर पाएंगे तो इनको कुचलने के लिए अंग्रेजों से हाथ मिला लिया। तय हुआ कि रियासतें ईस्ट इंडिया कंपनी को सालाना भुगतान करेगी और एवज में कंपनी रियासतों को फौजी मदद देगी।
दिन 5 मई 1922। समय सुबह के 10 बजे। स्थान- भूला-वालोरिया की लीलुड़ी-बड़ली का तलाई क्षेत्र। स्वतंत्रता सेनानी मोतीलाल तेजावत की हुंकार सभा में जमा करीब पांच हजार वनवासी आदिवासी। सबका साथ था लिहाजा आंदोलन को नाम दिया गया एकी आंदोलन। एकी का मतलब एकता से है। सभा में जमा वनवासियों पर फिंरगी फौज की पांच कंपनियों ने तोपों और बंदूकों से धावा बोल दिया। फोज का नैतृत्व राजपूताना के एजीजी गवर्नर जनरल के एंजेंट का सेकेट्री मेजर एच आर एन प्रिचर्ड कर रहा था। मेजर इतना क्रुर था कि इसने उन आदिवासियों को भी भून डाला जो अपने घायल साथियों को कंधे पर लाद ले जा रहे थे। जमीन पर इतनी लाशें बिछा कर भी मेजर शांत नहीं हुआ। उसने भूला-वालोरिया गांव को आग के हवाले कर दिया।
जहां जमीन पर लाशें बिछी थी वहीं गांव में घर आग के हवाले हो चुके थे। इस अग्निकांड में कई वनवासी महिलाएं, पुरूष, मवेशी, फसलें देखते ही देखते राख में तब्दील हो गए। फिरंगी अब भी नहीं पिघले थे। वे लूटपाट करने लगे। बताते है कि इस आंदोलन में आठ सौ वनवासी शहीद हुए। ताज्जुब इस बात का है कि इतिहास में लगान न देने के कई आंदोलनों का जिक्र है लेकिन इस आंदोलन का जिक्र तक नहीं।
हां कहने को सूबे की सरकार के पूर्व मुख्यमंत्री व कुछ नेताओं ने एक पत्थर तो यहां लगा दिया लेकिन शहीदों की याद में स्मारक कब बनेगा उसका जवाब जिम्मेदारों के पास नहीं।


correspondent

DesertTimes.in

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