नानी बाई रो मायरो की कथा का हुआ शुभारंभ

-संतो के जीवन चरित्र से हमको जीवन जीने की कला सिखने को मिलती है-पवनकृष्ण महाराज
सरुपगंज।स्थानीय कस्बे के चुनानी हनुमान मंदिर में श्रीमद् भागवत सेवा समिति के तत्वावधान में मंगलवार को नानी बाई रो मायरो की कथा का शुभारंभ हुआ। बालयोगी मुरलीदास महाराज ने बताया की नानी बाई रो मायरो की कथा गुरूवार तक आयोजित होगी।वृंदावन के प्रेम मूर्ति पवन कृष्ण महाराज ने कथा का शुभारंभ करते हुए कहा की नानी बाई रो मायरो अटूट श्रद्धा पर आधारित प्रेरणादायी कथा है।पवनकृष्ण महाराज ने कहा यदि भगवन को सच्चे मन से याद किया जाए तो वे अपने भक्तो की रक्षा के स्वयं आते है उन्होंने झांकियो के साथ विस्तार से वर्णन करते हुए कहा की नानी बाई रो मायरो की शुरुआत नरसी भगत के जीवन से हुई।नरसी का जन्म गुजरात के जूनागढ़ में करीब 600 वर्ष पूर्व हुमांयू शाशनकाल में हुआ।नरसी भगत जन्म से ही मुकबाधिर थे।उन्हें ना ही सुनाई देता ना ही कुछ बोल पाते।नरसी अपनी दादी के पास ही रहते थे।उनके भाई-भाभी भी थे।उनकी भाभी के स्वाभाव का मिजाज कड़क था।एक संत के आशीर्वाद से उसकी खोई हुई आवाज और बहरापन ठीक हो गया था।नरसी के माता पिता गाँव की एक महामारी का शिकार हो गए।नरसी का विवाह हुआ लेकिन अलप समय में ही उनकी पत्नी भगवान् को प्यारी हो गई।नरसी जी का दूसरा विवाह किया गया।समय बीतने पर नरसी की पुत्री नानीबाई का विवाह अंजार में पक्का हुआ।इधर नरसी की भाभी ने उन्हें घर से निकाल दिया।नरसी श्री कृष्णा के परम भक्त थे वे उनकी भक्ति में लग गए।भगवन शंकर की कृपा से ठाकुर जी नरसी भगत को दर्शन दिए उसके बाद तो नरसी ने सांसारिक मोह त्याग दिया और संत बन गए।उसके बाद पुत्री विवाह लायक हो गई लेकिन नरसी को कोई खबर नहीं थी।लड़की के विवाह पर ननिहाल की तरफ से भात भरने की रस्म के चलते ऐनवक्त पर नरसी को सूचित किया।नरसी के पास उस समय देने के लिए कुछ भी नहीं था।उसने भाई बंधू से मदद की गुहार लागै लेकिन वो मदद तो दूर साथ चलने को भी टॉयर भी नहीं थे।ऐसे में टूटी-फूटी बैलगाड़ी लेकर नरसी खुद ही लड़की के ससुराल के लिए निकल पड़े।कथा के दौरान पवनकृष्णा महाराज ने कहा की संतो का चरित्र हमारे जीवन को भक्तिपथ की ओर अग्रसर करता है।उन्होंने कहा की बच्चों को बचपन से संतो के सानिध्य तथा सत्य का संग करवाना चाहिए।उन्होंने कहा की संसार में ऐसा कोई मनुष्य नहीं जिससे गलती ना हुई हो लेकिन सच्चा व्यक्ति वही है जो अपनी गलती को स्वीकारे।कथा के बीच पवनकृष्ण महाराज द्वारा तेरी मर्जी का मैं हु गुलाम मेरे अलबेले राम….जैसे मधुर भजनों पर पंडाल में बैठे श्रद्धालु झूम उठे।इस अवसर पर ओमप्रकाश गुप्ता,कमलकुमार सुथार,जगदीशप्रसाद अग्रवाल,ललितादेवी बंसल,ललिता गुप्ता,आशा शर्मा,इंद्रा देवी,सौरभ शर्मा समेत कई गणमान्य लोग उपस्थित रहे।


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DesertTimes.in

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