पैरेंट्स ध्यान दें : बच्चों पर साइबर बुलीइंग का खतरा

— साइबल बुलीइंग के खतरे से स्कूली बच्चे सेफ नहीं
— एक अध्ययन के मुताबिक 17 प्रतिशत बच्चे साइबर बुलीइंग के ‘शिकार’, दिमाग पर भी असर
जैसलमेर । आज के साइबर युग में पैरंट्स का रोल बढ़ गया है । उन्हें अपने बच्चों पर नजर रखनी होगी कि कहीं वे साइबर बुलीइंग के शिकार तो नहीं हो रहे हैं । एक अध्ययन में सामने आया है कि साइबल बुलीइंग के खतरे से स्कूली बच्चे सेफ नहीं हैं। इस अध्ययन में 17 प्रतिशत बच्चे इसका शिकार पाए गए हैं। स्मार्ट फोन और इंटरनेट के बढ़ते चलन से अब स्कूली बच्चे खुद शिकार बनने के लिए दूसरों बुलीइंग करने में भी पीछे नहीं है। इस अध्ययन को एशियन जरनल ऑफ साइकायट्री ने प्रकाशित किया है।
हैरानी की बात
स्टडी में हैरानी की बात है कि 70 प्रतिशत बच्चों को साइबर बुलीइंग के बारे में पता था। 17 प्रतिशत बच्चे बुलिंग के शिकार थे। 7 प्रतिशत बच्चों ने माना कि वे दूसरों की बुलिंग कर चुके हैं। स्टडी में पाया गया कि 15 प्रतिशत बच्चे शारीरिक तौर पर भी बुलिंग के शिकार हो रहे हैं। इसमें मारपीट की धमकी देकर डराया गया था।
क्या है साइबर बुलीइंग
डॉक्टरों की मानें तो बुलिंग का मतलब तंग करना है। इतना तंग करना कि पीड़ित का मानिसक संतुलन बिगड जाए। बुलीइंग पीड़ित को मानसिक, इमोशनल और दिमागी रूप से प्रभावित करती है। बुलीइंग जब इंटरनेट के जरिए होता है तो इसे साइबर बुलीइंग कहते हैं।
पैरंट्स का रोल
डॉक्टरों की मानें तो बच्चे को अब स्मार्ट फोन और इंटरनेट के यूज से रोक पाना तो मुश्किल है, लेकिन पैरंट्स का रोल बढ़ गया है। उन्हें अपने बच्चों के बर्ताव पर नजर रखनी होगी। उन्हें बच्चे पर नजर रखनी होगी कि उनकी नींद कैसी है। खानपान में दिलचस्पी, चिड़चिड़ापन, रिश्तेदारों से मिलने से कतराना और अकेले रहने के लक्षण किसी प्रकार के तनाव की वजह हो सकते हैं। टीचरों को इसकी ट्रेनिंग होनी चाहिए कि बच्चों का बर्ताव अचानक तो नहीं बदल रहा।


correspondent

anand m vasu

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