निखिल के साथ एक कहानी कुछ कहती है- “युगों तक युवाओं के दिल में यादें”

निखिल के साथ एक कहानी कुछ कहती है में आज बात राजस्थान के सीमांत गांव बाड़मेर से। कहानी का किरदार विषम हालात में जिंदगी का सफर शुरू करता है। मां-बहन के दुलार को बचपन में ही गंवा बैठता है लेकिन युवा होने तक अपनी आंखों से देखे सपने हकीकत में बदलते देखता है। जीवन की कठिन दौर से गुजर एक दिन देश में पद्मश्री से नवाजा जाता है।

अापदाओं के बीच
राजस्थान का सीमान्त थार जिला बाड़मेर। जहां कि भौगोलिक परिस्थितियां अन्य कई जिलों से बिल्कुल अलग। प्राकृतिक आपदाऐं जहां पग-पग पर मुंह बाये खड़ी। अकाल जहां का स्थायी मेहमान, तो पेयजल एक विकट समस्या, इसलिए रोजगार केवल कृषि एवं पशुपालन तक सिमटा हुआ। यहां के मानव जीवन को अगर जटिलताओ एवं चुनौतियो का दूसरा नाम कहें, तो कोई अतिश्योक्ति नहीं होगी।
बचपन में खोया मां का प्यार
बाड़मेर के गांव शिव में, खंगारमल जैन के घर, 24 मार्च 1929 को जन्मे मगराज। बालक के जन्म की खुशियां परवान चढने ही लगी थी कि मां राजांदेवी का देहावसान हो गया, यही नहीं देखते ही देखते आपके छोटे भाई व बड़ी बहिन को भी बीमारी ने लील लिया और मात्र 8 वर्ष का बालक मगराज सब कुछ देखता रह गया। घर में केवल पिता व पुत्र बनें- एक दूसरे का सहारा। आपके चाचा प्रागराज और भुआ भारत- पाक बंटवारे के समय, सिंध चले गए और वहीं बस गये।
कांटो में निखरा
बालक मगराज की प्रारंभिक शिक्षा, पास के गांव गूंगा में हुई। मीलों पैदल स्कूल का सफर यहां से पांचवी पास कर, आगे की पढाई के लिए बाड़मेंर आए। अपने रिश्तेदारों के यहां एवं जैन छात्रावास में रह कर आपने दसवीं कक्षा उत्तीर्ण कर ली। विपरीत परिस्थितियो के चलते मगराज जैन आगे पढाई नही कर सके और जीविकोपार्जन हेतु अध्यापक की नौकरी ले ली। नौकरी करते हुए उन्होनें आगे पढ़ने की अपनी तमन्ना पूरी करने के लिए संसाधन जुटाते हुए पिलानी से इन्टर पास किया, फिर स्नातकोत्तर डिग्रीयां प्राप्त की एवं अध्यापन कार्य में जुट गए।
बाल्यावस्था में ही मां व भाई का देहावसान, बीमारी में बहिन की मौत , अकाल व सूखे से खत्म होते आजीविका के साधन, भारत-पाक बंटवारे के दंश ने उनके चेतन अवचेतन मन पर बहुत ही गहरा प्रभाव डाला। अपनों का जिन्दगी से दूर हो जाना और अजन्मे ही सपनो का मृत्यु का पा जाना, किसी भी व्यक्ति को समय से पहले तोड़ सकता है।
एक संकल्प खुद से दूजों के लिए
लेकिन इन्ही समस्याओ को चुनौती मानकर मगराज जैन ने संकल्प लिया कि वे उन अवसरो की तलाश करेंगे जहां पर हर व्यक्ति खास तौर से दलित, शोषित, पीडित एंव महिला को अपने सर्वागीण विकास के अवसर मिले और प्राकृतिक आपदा-विपदा से कोई घर बिखर नहीं जाये। ऐसी विकट परिस्थितियों एवं अभावों ने मगराज जैन को फौलादी तो बना ही दिया था।
वें बिन्दु से सिन्धु बन गए
1961 -62 में प्रारंभ किए गए सेवा कार्यों के साथ-साथ आपने 1965 एवं 1971 के भारत पाक युद्ध के विस्थापितों के लिए भोजन के पैकेट वितरित कराने एवं आवास आदि की व्यवस्था में सक्रीय भागीदारी निभाई। शहरी युवाओं में कौशल विकास के लिए वाचनालय – पुस्तकालय, संगीत, पॉवर लिफ्टिंग, कुश्ती व टंकण प्रशिक्षण की नियमित एवं सुचार व्यवस्था के साथ – साथ भारत सेवक समाज की स्थापना एवं उसके माध्यम से सीखों कमाओं योजना के बहुआयामी प्रकल्प थे। वर्ष 1972 में उनकी उल्लेखनीय सेवाओं के लिए उन्हें राजस्थान सरकार द्वारा राज्य स्तरीय शिक्षक सम्मान से जयपुर में नवाजा गया।
सेवा को जीवन का ध्येय मानने वाले जैन का रूझान उस समय स्थापित होने वाले नेहरू युवा केन्द्र की ओर गया, आपने अपने कार्यक्षैत्र को विस्तार देने के उदेश्य से नेहरू युवा केन्द्र के समन्वयक पद पर नियुक्ति हुए। उन दिनों नेहरू युवा केन्द्र खेल, लोक कला एवं संस्कृति, ग्रामीण युवाओं को राष्ट्रीय योजनाओं से परिचित कराना, जन जागरण आदि कार्यो को प्रोत्साहित करने, संवर्धन एवं संरक्षण करने की विभिन्न गतिविधियों के आयोजन पर बल देता था, परिणामस्वरूप जैन ने एक दर्जन से अधिक गैर सरकारी संस्थाओं से जुड़ते हुए ग्रामीण एवं पिछड़े इलाकों के लोगो के विकास की सुध ली। युवा कल्याण समिति, खेल, लोक संगीत के लिए मरूधर लोक कला केन्द्र की स्थापना, महिला एवं बाल विकास, प्रोढ शिक्षा, गौ सेवा, थारपारकर एवं नशा मुक्ति मुख्य कार्यक्रम थे।
इसी दौरान जैन का ध्यान इस क्षेत्र के लोक कलाकारों को उचित मंच प्रदान करने की ओर गया। बाड़मेर जैसलमेर का सीमान्त क्षेत्र लोक गायकी व लोक वाद्यों के वादन में अग्रणीय एवं खास स्थान रखता था लेकिन उनकी कला को राज्य देश एवं अंर्तराष्ट्रीय स्तर पर पहुंचाने का महत्वपूर्ण कार्य जैन ने किया।
नवाजे गए
स्थानीय लोक कला को ऊंचे एवं प्रतिश्ठित मंचो पर स्थापित करने के परिणामस्वरूप हमारे देश का नाम विदेशों में भी रोशन हुआ। कहते है, निःस्वार्थ भाव से किया काम एंव की गई सेवा एक दिन जरूर सफल होती है। ऐसा ही हुआ, जब लोक कला एवं संस्कृति के संर्वधन व संरक्षण के महत्वपूर्ण सेवा कार्य के लिये मालाणी के लाडले सपूत मगराज जैन को सन् 1989 में पद्म श्री सम्मान से नवाजा गया।
दिल में था एक सपनों का गांव
ग्रामीण इलाकों में यातायात एवं परिवहन के लिए ऊंट गाड़ों का किफायती दर पर निर्माण, पानी की टंकी का ऊंट गाड़ों के साथ उपलब्ध करवाने से, ग्रामीण इलाकों की जरूरत को पूरा करना व लकड़ी पर नक्काशी, पेच वर्क के प्रोत्साहन गलीचा बुनाइ्र्र अत्यंत नवाचार था। साथ ही 40 से अधिक विभिन्न व्यवसायों से सैकडो युवक-युवतियो को जोड़ना बेमिसाल था। उनके शिक्षण/प्रशिक्षण, रोजगार के लिए की गई संकल्पना संपूर्ण थार क्षेत्र में बदलाव की दस्तक दे रही थी। समय अपनी गति से आगे बढ रहा था तो कदम से कदम मिलाते हुए पद्म श्री जैन अपने सहयोगियो, बुद्विजीवियो,विषय-विशेषज्ञो एवं सेवा के प्रति समर्पित भाव रखने वाले सैकडो युवाओ के सहयोग सें सेवा कार्य को विस्तार दे रहे थे।
यूं हुआ श्योर का आगाज
उन्होने इस क्षेत्र में लगातार पड़ने वाले सात सात भयंकर अकालों एवं उनकी मार को अधिक निकटता से देखा था इसलिए वे चाहते थे कि बाड़मेर में एक ऐसी संस्था हो, जो रोजगार, दलित, शोषित, पीडित एंव महिला एवं कृषि कार्यो के उन्नयन हेतु कार्य करे । इस हेतु उन्होने 1990 में श्योर संस्था की स्थापना की एवं वर्षो तक आपने उसके मानद सचिव रहकर, कई कार्यो को अंजाम दिया।
कई नवाचार किए
जैन ने थार क्षेत्र में सुरक्षित प्रसव प्रसुति के लिए परम्परागत दाईयों को प्रशिक्षित भी कराया तो सस्ती सुलभ हौमियोपेथी चिकित्सा का शहर एवं गांवो में प्रचार प्रसार शुरू किया। सीमा के गांव आरबी का गफन जहां सड़क, पानी तक की व्यवस्था नहीं थी में होस्पीटल स्थापना अपने आप में मिसाल है, एवं संसाधनों को मध्यनजर रखते हुए हस्तशिल्प, भरत, थारपारकर नस्ल संवर्धन, डेयरी, शुष्क कृषि, बागवानी, चारागाह विकास, बालिका शिक्षा, वैकल्पिक चिकित्सा पद्वतियों का प्रचार प्रसार, युवा विकास, नशा मुक्ति, गैर कृषि कौशल, कृषि के उन्नयन हेतु आपने कृषि विज्ञान केन्द्र की स्थापना वर्ष 1992 में की एवं चौहटन के बीजराड गांव में रोजगार के नूतन अध्याय जोड़ने का श्रेय भी जैन को जाता है।
दलितों के लिए मन से काम
दलित एवं विकलांगो के सशक्तिकरण से विकास की उनकी चाहत से थार में एक आशा की किरण फूट पड़ी है। जिले के निशक्तजनों की ओर अब तक किसी का ध्यान नहीं गया था। जैन ने दिव्यांग जनों के सशक्तिकरण हेतु अंध मूक व बधिर विद्यालय की स्थापना के साथ साथ मंद बुद्धि पुनर्वास गृह की व्यवस्था कर एक नया इतिहास रच डाला। जिसमें आज सैकड़ो बालक/बालिकाऐं अपने सपने साकार कर रहे है। पद्मश्री मगराज जैन 86 वर्ष की आयु पार कर 4 नवम्बर 2014 को हमें छोड़ कर विदा हो गए, लेकिन उनका वरद्हस्त, मार्गदर्शन, कुशल नेतृत्व एवं प्रबंधन आने वाली पीढीयो के लिए प्रकाश-पुंज बन मार्ग प्रशस्त करता रहेगा।


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