गुरू के बिना आत्म कल्याण का मार्ग प्रशस्त नहीं हो सकता :मुनि

बाड़मेर। आचार्य देेवेश श्री जिनपीयुषसागरसूरि म.सा की निश्रा में गडरा रोड़ स्थित पीरचंद हंजारीमल वडेरा भवन में उपधान तप की आराधना साधनामय रूप से चल रही है प्रखर प्रवचनकार मुनि सम्यकरत्नसागरजी महाराज ने सुखसागर उपधान तप वाटिका में उपस्थिति आराधकों को संबोधित करते हुए कहा कि कदाग्रही कभी भी मुक्ति को प्राप्त नहीं कर सकता है। संसार में रहकर जितने भी कार्य किए जाते है, वो सब पापकार्य है। जन्म लेना ही पापों को जन्म देना है। भगवान ने जो किया वो नहीं करना है, हमें तो भगवान ने जो कहा है वो करना है। उत्तम आत्मा को बार-बार गुरू की आवश्यकता नहीं होती है। गुंरू के बिना आत्म कल्याण का मार्ग प्रशस्त नहीं हो सकता है। मुनि श्री ने कहा कि ये संसार पूर्वजनित संस्कारों के अनुसार चल रहा है। संसार में रहकर सभी प्रकार के कर्मों के बंध किया है, सिर्फ तीर्थंकर नामकर्म का बंध नहीं किया है। सुख प्राप्ति और दुःख मुक्ति के लिए जो पुरूषार्थ करता है वे ही अध्यात्म जगत में प्रवेश कर सकता है। संसा एकांत रूप से दुःखमय है। इन्द्रियों का स्वभाव नाशवान, अतृप्ति है। मन असंतुष्ट है, परिवर्तनशील है। भगवान ने जो कहा वो सब अनुभव की कसौटी पर कसकर कहा। अज्ञान जब तक रहता है तब तक संसार के दुःख आत्मा के सुख समझ में नहीं आता है। गलत बात पकड़ में आये और उसे छोड़ना गलत नहीं है, सही बात को पकड़ने के बाद छोड़ना गलत है। अध्यात्म जगत में की यात्रा शून्य से प्रारम्भ होती है। परमात्मा को पहचानने का एक ही द्वार है वो गुरू का द्वार है।


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DesertTimes.in

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