एक चिड़िया: वो पेड़ की डालियाँ, जैसे सूना बन्दरगाह रहा…

युवा कवि जालाराम चौधरी

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जालाराम चौधरी

एक अनोखी चिड़िया है आई
हरे-भरे कोमल सी कोंपल पर जा बैठी
मुरझाये हुए डालों से ऐंठी
और पूछा मेरे तन को
दूरबीन सी गहरी नजरों से
और छलका रही थी मन में
देख रही थी कातिल नजरों से
मैं बहुत समय तक देखता गया तब
मेरा मन भी चिड़िया बन गया तब
मैने उसके दुःख दर्द को जाना
और अक्षुण्ण आँखों को पहचाना
उजड़ गया था घोंसला उनका तब
जब मानव ने घर बनाया
घर भी ऐसा,क्या बनाएँ?
जिसमें पक्षी है रुलाएँ!
मैंने उनके मन को फिर से
एक दिलासा का तार दिया
मेरा,उनका मन भी रोया फिर से
क्यूँकि छोड़ घर-बार दिया
मैं बड़ा परेशान था जब से
पक्षी के प्रेम में झाँका
कितना दुःख-दर्द देते है
और मानव-मानव की भी
खूब बड़ाई कर लेते है
एक बात नन्हे पंछी ने कही जब
आँखे मेरी भी छलक आई
मैने क्या गुनाह किया जो
हर-बार मेरे घर को उजाड़े
मैने तो एक बार भी कोई
मानव के मन को न दुःखलाया
मैं भरी आँखों को पोंछता
मेरे मन को कोस रहा था
अगले जन्म में मानव न बनना
मन ही मन में सोच रहा था
जब तलक दिलासा के मेरे हाथ उठते
तब तक वो चिड़िया फुर्र हो गयी
रोजाना के सुबह की लालिमा में
मुझे उनका इंतजार रहा
रंग-रूप में जानता था
ढेरो चिड़ियाओं में भी पहचानता था
पर नहीं आई वो कभी भी मुझसे मिलने
वो पेड़ की डालियाँ जैसे
सूना बन्दरगाह रहा…!

correspondent

DesertTimes.in

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