केसर के खेतों में कैसे, इतनी खरपतवार हो गई…

कवि: प्रमोद श्रीमाली

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प्रमोद श्रीमाली

खुशबू अब खूंखार हो गई,
पीढ़ी पत्थर मार हो गई।

फूलों के इस देश में देखो,
कैक्टस की भरमार हो गई।

केसर के खेतों में कैसे,
इतनी खरपतवार हो गई।

आग लगाई जब सूरज ने,
आसमान से धार हो गई।

बहुत चिकित्साविद आए तो,
ये बस्ती बीमार हो गई।

घर की बातें बाहर पहुंची
तो घर में दीवार हो गई।

अब प्रमोद प्रतिशोध जरूरी ,
मुश्किल सिर के पार हो गई।

correspondent

DesertTimes.in

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