चिमनियों ने लूट लिया मेरा चमन

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विश्व पर्यावरण दिवस पर विशेष रिपोर्ट

बाड़मेर। पश्चिम राजस्थान के सुरम्य और शांत वातावरण में निवास करने वाले ग्रामीणों ने कभी सपने में भी नहीं सोचा होगा कि ठेठ भारत पाक सीमा के पास भी कोई पर्यावरण का दुश्मन डेरा लगाकर ग्रामवासियों के पटरी पर चल रहे जीवन में खलल डाल देगा। एक समय था जब भादरेश, ईश्वरपुरा, धनोड़ा, कपूरड़ी, जालिपा, भादरेश गांधव, प्रतापाणियों की ढ़ाणी, दौलाणियों की ढ़ाणी, भादरेस पुनसिया समेत आस पास बीसीयों गांवों में जहां तक नजर जाती थी बड़े बड़े रेत के टीलों के बीच खेजड़ी, जाल, कुम्बटिया, बबूल और नीम के पेड़ों को ग्रामीणों ने अपनी जान से भी ज्यादा पालपोस कर बड़ा किया था। इन हजारों पेड़ – पौधों को जाने किसकी नजर लग गई कि यहां आई बिजली बनाने वाली कम्पनी ने लिग्नाईट खनन के नाम पर बलि चढ़ा दी और यही काम निरंतर आगामी 25 से 30 वर्षों तक जारी रहने वाला भी है। विकास के नाम पर काम करने वाली बिजली कम्पनियों को उनके द्वारा प्रकृति के साथ की गई छेड़छाड़ के लिए नए पेड़ लगाने का प्रावधान है परंतु यहां काम करने वाली कम्पनी ने केवल अपने परिसर में थोड़ी बहुत हरियाली करके अपने कर्त्तव्य की इतिश्री कर ली। वहीं गांवों खनन क्षेत्र में काटे गए पेड़ों की भरपाई करने के नाम पर किन्ही टुटूपूंजिया एनजीओ के माध्यम से केवल खानापूर्ति कर कागजी पौघे लगा दिए। जो थोड़े बहुत पेड़ पौधे लगाए भी थे तो वे कालांतर में देख रेख के अभाव में समाप्त हो गए।
भादरेस में स्थापित राजवेस्ट पावर प्लांट की दानवाकार चिमनियां दिन में समय तो सुहावनी लगती है वहीं राते में समय बड़ी मात्रा में धुंआ उगलती चिमनियां सुरसा के मुंह की मानिन्द नजर आती है। ऐसा जान पड़ता है मानो वो सब कुछ अपने आगोश में लेकर अंधकारमय कर देना चाहती हों। विकास के नाम पर प्रकृति के साथ हो रहा खिलवाड़ तब तक होता रहेगा जब तक कि इंसान की धनलिप्सा शांत नहीं हो जाती।
बीते कई दशकों से इस पश्चिमी मरूस्थल में मानव और पशुधन के पेयजल का मुख्य आधार रही बेरियों और खेत की आगोर में बने कच्चे पक्के टांकों में एकि़त्रत वर्षा के पानी को इन राक्षसी प्रवृति की चिमनियों के धुएं से बनी फ्लाईऐश ने दूषित कर दिया। परिणामस्वरूप सुदूर ग्रामीण ढ़ाणियों में जहां पर सरकारी जीएलआर या कम्पनी की पाइपलाईन नहीं पहुंची है उन ढ़ाणियों में पेयजल का संकट उत्पन्न हो गया है। वहीं मरूस्थलीय वनस्पति केर, कुम्बटिया, सांगरी के भाव भी आसमान छूने लगे हैं। कभी इस क्षेत्र में चाव से खाई जाने वाली पंचकुट सब्जी का तो मानो अकाल से पड़ गया है।
रात के समय भादरेश गांव में जाईये आस पास के कई किलोमीटर तक आसमान में केवल धुंए के घने काले बादल हर समय छाए रहते हैं। कहते हैं मरूस्थल की रातें बहुत ठण्डी होती है इसलिए यहां के लोग रात के समय घर के बाहर ही सोते थे परंतु इन मानव निर्मित दानवों के भय से अब लोगों ने घर से बाहर सोना बंद ही कर दिया है। क्योंकि रात में बाहर सोए लोग जब सुबह जगते हैं तो उनके बदन पर कार्बन की तह सी बन जाती है। ग्रामीण बताते हैं तो दिन के समय तो घुंए के बादल और निकलने वाली गैसों का अहसास नहीं होता परंतु रात के समय धूल कण नहीं होने से ये साफ साफ दिखाई पड़ती है। इनसे अनवरत 24 घण्टे निकलने वाली कार्बनडाई आक्साईड, सल्फरडाई आक्साईड, नाईट्रोजन आक्साईड, एसपीएम समेत कई प्रकार की जहरीली गैसों से यहां के लागों में हाईपरटेंसन, चिड़चिड़ापन, बहरापन, दमा, अस्थमा जैसी कई बीमारियों घर कर गई है। बताते हैं कि यहां पर ध्वनि प्रदूषण भी मानक स्थिति से बहुत अधिक हो गया है। जिससे लोग चिड़चिड़ेपन का शिकार हो रहे हैं।
यूं तो हर साल यहां पर जिला प्रशासन और कम्पनी के जिम्मेदारों की मौजुदगी में पर्यावरण को लेकर जन सुनवाई होती है परंतु वास्तविक अर्थों में इस जनसुनवाइ र्में सुनी गई बातों पर अमल नहीं हो पाता। समय रहते इस पर नियंत्रण नहीं किया गया तो भादरेस और इसके आस पास के कई गांवों के साथ बाड़मेर जिला मुख्यालय को भी इसका खामियाजा भुगतना पड़ेगा। यहां के सीधे साधे ग्रामीणों को विकास कीमत अपनी जान देकर चुकानी पड़ेगी।

correspondent

DesertTimes.in

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