मेरा थार…कवि रेवंतदान की नई रचना

कवि: रेवंतदान बारहठ

रेवंतदान बारहठ

मेरा थार

मेरा थार जब तपता है
और तपकर भट्टी बन जाता है
उस वक़्त इसके तापमान को
नापने की औक़ात किसी
सेल्सियस डिग्री की नहीं होती।
मेरे थार का फूटरापा-
उगते सूरज की लालिमा में,
सोने की तरह चमकते कण-कण में है
यहाँ के ग्वालों की कूकारियों में,
यहाँ के किसानों की ‘भणत’ में,
सैकड़ों ‘पुरस’ गहरे कुओं के पानी
और उन कुओं से भी गहरे सुभाव के
मीठे भोले माणसों में है।
तुम्हारा आना व्यर्थ है सैलानी
ठंड के ‘मरू महोत्सव’ में
तुम्हारी ‘रॉयल पैलेस ऑन व्हील्स’
पाँच सितारा होटल की पार्टियाँ
उन पार्टियों में नाचती कोई
लीपि पुति कालबेलिया युवती,
सजे-सँवरे सुभराज करते माँगणियार
सम के धोरे,पाकेट ऊँट
और उन ऊँटो के मींगणों के फ़ोटो लेते
तुम्हारे डिजिटल कैमरों में
कहाँ क़ैद हो पाता है मेरा थार।


correspondent

DesertTimes.in

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