कहानी : बेजुबां दर्द

लेखक: माधव राठौड़

माधव राठौड़

“मामीसा,मामीसा! मामोसा आ गये”
बाहर मोटरसाईकिल की आवाज़ व अबोध बालिका के स्वर सुनकर वह तंद्रा से जागी उसने रसोई की बारी से झांका तो पतिदेव की गाड़ी दिखाई दी। शाम ढल चुकी थी।रेगिस्तान की शाम तपते दिन के बाद थोड़ी राहत भरी महसूस होती है मगर हल्की सी लू को अब भी महसूस किया जा सकता है रात अपना कैनवास धीरे धीरे फैलाती है क्योंकि आधी रात ढलने के बाद ही तपता रेगिस्तान ठंडा होने लगता है ।सूर्यदेव सुबह उगते ही फिर उसी जोश के साथ तपते है तो इस माटी के लोग भी उसी जोश से अपना जीवन संघर्ष शुरू करते है बिना शिकायतों के।

सुबह से साँझ तक गृह्स्थी का सारा काम और साथ ही दिनभर किसी के इंतजार को निहारती पलकें थक सी गई थी। मगर उम्मीद के काजल से भरी आँखे उसे थकने से मना कर रही थी। क्योंकि इस रेगिस्तान में उम्मीद और आँख का पानी कभी खत्म नहीं होता। चाहे कितने भी छप्पनियां अकाल पड़े हो या घड़ों में पानी को जमाती ठण्ड हो। यहाँ जीवन कभी भी किसी भी हालात में रुकता नहीं और इन सभी अभावों में भी पनपती रहती है गहरी सम्वेदनायें।
पति इस बार जिला परिषद सदस्य के लिए टिकट की दावेदारी कर रहे है इसलिए भागदौड़ के कारण ज्यादातर समय शहर में ही रहते है वैसे भी बाकी दिनों में भी वो गाँव देर से ही लौटते है। ढाणी में कुल जमा चार प्राणी। लोक लजा के नाम पर दिन में शायद ही कभी बात हो,कनखियों से जी भर देख भी नहीं पाती। रात में भी झोपें में गुप्प अँधेरे में स्पर्श और गंध ही प्यार के अनुभव को अनुमानित करवाती। घरों में बातचीत की ज्यादा गूंजाइश नहीं रहती।इसलिए दिनभर प्रियतम की मधुर छवि बुनना और उसमे ही खुद को व्यस्त रख घर के काम में खपा देती।
आते ही वो बाहर चबूतरे पर पिताजी के पास बैठ गये। पिताजी उपेक्षित भाव से चिलम पिते रहे,जैसे उसके आने का कोई विशेष प्रभाव नही पड़ा, वे धुँए के साथ खांसते रहे। वो जब भी चिलम का सुट्टा भरते उतनी ही गति से फेफड़े मना करते, खाँसते हुए दम घुटने लगता, नसें उभर जाती, चिलम का उपर रखा खीरा कभी दहकता तो कभी मंद पड़ता। वो दो चार से ज्यादा सुट्टा नहीं भर पाते और बीच में ही बुझा देते। चिलम के धुँए से हथेली में गहरा लाल निशान पड़ गया था यह रोज का काम था। उनके खाँसी से उलझने को छोड़ मां उठकर बाहर बकरियों को ठंडी रोटियाँ देने चली गई। काफी देर तक उस रेगिस्तान की आहिस्ता-आहिस्ता ठंडी गहराती रात के साथ मौन पसरा रहा। दूर बाड़ों पर बकरियों और भेड़ो के शोर सुनाई दे रहा था।
रात का दृश्य
“गायों के लिए चारा खत्म हो गया है और मीठे पानी की टंकी भी डलवानी है” पिताजी ने चिलम झाड़ते हुए चुप्पी तोड़ी। चारे के लिए “धनजी” से बात हो गई है और “खेतिया”कल शहर से मीठे पानी की टंकी डाल देगा” वह एक ही साँस में बोलके चुप हो गया। अक्सर पिताजी के साथ उसका इतना ही संवाद होता था, कभी कभी तो बिलकुल भी नही।
पिताजी को लगता था उसे 200 भेड़ बकरियों को सम्भालना चाहिए और यह राजनीति अपने बस की बात नहीं। उन्हें गाँव की राजनीति कभी पसंद नहीं रही, उन्हें नेताओं और पंचों से अजीब कोफ़्त महसूस होती थी। उनका मानना था कि यह लोग ही घरों की शांति भंग के लिए मुख्य रूप से जिम्मेदार है। इसलिए जब से बेटे ने राजनीति की कुरता सिलवाया तब से संवाद कम ही हो गया।
झोपड़े में खाना बनाते वक्त उसके कान बाहर लगे हुए थे ,कभी कभी वो छेद से बाहर झांक मंद मंद मुस्काती और विचारों में खो जाती। “वह आज खुश थी आज ही उसके पीहर से मांगणियार आया था चचेरे भाई की शादी में आने का निमंत्रण देने। वो इंतजार कर रही थी कि कब रात होगी और वो उनसे कल पीहर जाने की अनुमति लेगी”

जली हुई रोटी की गंध ने उसे सचेत किया रोटी पलटने को। हाँ,वो अनपढ़ थी, गाँव की थी मगर सपने बुनने और उसमे खोने का उसको भी हक था। उसे पता नही प्यार क्या होता है भावनाएं क्या होती है मगर वह महसूस तो कर रही थी कुछ अपने अंदर अच्छा सा खट्टा मीठा। घुंघट ने उसके चेहरे पे पर्दा जरुर डाल रखा था मगर वो हिये की हलचल तो महसूस कर ही सकती थी।

आज उसने पति की पसंदीदा सब्जी गवार फली और काचर बनाई थी। सब्जी, बाजरे की रोटी और छाछ उसने रसोई से बाहर की तरफ सरका दिये। मगर वो किसी उधेड़बुन में व्यस्त था उसका ध्यान इस तरफ नहीं गया। वह पुकार कर बता नहीं सकती थी बाहर चबुतरे पर सास-ससुर बैठे जो थे, इसलिए उसने पास रखे झेरने से बर्तन पर हल्के से चोट की, जिससे पति का ध्यान इस और हुआ तो उसने मुल्कते हुए खाने की और इशारा किया। मुस्कराहट का जवाब दिए बिना थाली उठा ली।
“साजन गली संकरी सामे मिल्या सैण।
हँसयाँ पर बोल्यां कोनी नीचा कर गया नैण।।”

वो उदास हो गई। वो सोचने लगी कि…उसका भी क्या जीवन है बस भेड़-बकरियां, चुल्हा और गार-गोबर और ये ढाणी, काश मैं कुरजां होती तो उड़ती-फिरती देश-परदेश। सास-ससुर से बोल नहीं सकती, रात को सास ससुर बाहर सो जाते वह अकेली ढाणी में बने झोपें में अपने सपनो की करवटे बदलती हुई सो जाती, मगर नींद भी भला किसे आये
“काली रात डरावनी नगर गयो सब सोय।
जाको चिन्ता पिया री नींद किस विध होय।।”

अलसुबह वह घरटी पीसने के लिए जल्दी उठ जाती। अपने मन की बातें किसी को सुनाए उसे कितना समय बीत गया। न लड़ाई झगडे के लिए ननद है,न ही छेड़ने और परेशान करने के लिए देवर। बस दिल बहलाने के लिए ननद की बेटी है वह भी अभी छोटी है। हाँ,कभी कभी छाछ माँगने के लिए गाँव से मंगनियारी आ जाती तो उससे बातें करती। वो पूरे गाँव का रेडियो थी, उसे सब खबर देती। वो पास के शहर जाती तो उसके साथ सामान भी मंगाती, होठ पालिश नख पालिश, इतर, आँखों के लिए सूरमा या काजल और काँच की चूडियाँ।
मग्नियार की बातें
आज जब वो झाड़ू बनाने के लिए खींप काट रही थी तब जाळ पर बैठे उस पंछियो के जोड़े की अठखेलियां देखकर कितनी खुशी हुई थी। लेकिन दूसरी घड़ी ही किसी अकेले बैठे पंछी को देख वो गाने लगी
“हरिये बागा री कोयल्ड़ी,अमरत थारा बेण
किध विध काली पड़ी,किस विध रात नैण”

गाते गाते अचानक वह सोचने लगी क्या मुझे ऐसी अठखेलियां करने, हँसने-बोलने का अधिकार नहीं। वो मंगनियारी कितनी बातें सुनाती है मेरा पति ये करता है वो करता है। उसकी शादी को अभी दो साल भी नही हुए, मगर उसके जीवन कोई रस नही था। सपने और अरमान अक्सर देर रात तक इस खाट पर अकेली सोती रहती, जब कभी भी पति शहर से आते तो वो कुछ देर के लिये खिल सी जाती क्योंकि थोड़ी देर ही सही मगर एक अजीब सी कसमकसाहट होती जो देह को गर्मी देती, अनुभव देती पूर्णत्व का…एक ज्वार सा उठता उस तरफ से और मसल देता उसके शरीर को फिर कुछ ही मिनटों में समुन्द्र के उतरते भाटे की तरह निर्जीव सी एक तरफ धकेल दी जाती …वो उस चाँदनी रात में जलती रहती ,अपने अरमानों के साथ।एक हूक और टीस सी उठती किसी को अपने में समा लेने की,मन की बातें करने की,सपनों को सँजोने की,खिलखिलाने और रूठने की ।मन ही मन गा उठती आओ नी पिया था सूं सारी रात मनडे री बात कर लूँ।पर मन की बात अक्सर ही अधूरी ही रह जाती और पास में खराटे की आवाज उसके मन को बेध लेती,सपनों की दुनिया से निकाल हकीकत के धरातल पर पटक देती।
“मुझे टिकिट के बाबत अभी शहर जाना है” खाने के बाद हाथ धोते हुए उसने माँ से कहा और चल दिया। झोपड़े से शून्य में ताकती दो आंखे और दूर से जाती हुई मोटर साईकिल की आवाज ने तवे पे रोटी के जलने के साथ ही हिये की दाह को बढ़ा दिया था। कालजा भर आया आज दर्द से भरी बदली आँखों से बह निकली वो घुंघट में ही सुबकने लगी।
“प्रीत से प्रीत लगी,पिया दूर देशा न जा
बसो हमारी नगरी में,हम मांगे तुम खाये”

रेगिस्तान में पसरे गाँव की एक ढाणी की पीड़ा घुंघट की बाड़ में दहक कर पिघल रही थी। इस रेगिस्तान की मखमली बालू रेत में उसके अरमान ज़ज्ब है जो कभी कभी जून की इन धूल भरी आँधियों में बिखर जाते है उसके सामने, मगर कैसे समेटे उस दर्द को जो हियें के उस कोने से उठता है और आँखों के पोर पर आने से पहले ही लू उसे सूखा देती है। मगर यह उसकी नियति है इस थार और इसके हालतों से संघर्ष करते हुए खुद को और सूखे रेगिस्तान में किसी फोग से अपने अरमानों को हरा रखना।

correspondent

DesertTimes.in

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