मानव अब लो चेत, सृष्टि की जननी नारी ।।

अवधेश कुमार अवध

अवधेश कुमार ‘अवध’

कुंडलिया त्रय

(i)
नारी दुर्गा, चंडिका, नारी लक्ष्मी रूप ।
तप्त हृदय में छाँव यह, शीत लहर में धूप ।।
शीत लहर में धूप, प्रकृति की उत्तम रचना ।
वात्सल्य की मूर्ति, नराधम इनसे बचना ।।
करो अवध स्वीकार, पिता की राजदुलारी ।
मानव अब लो चेत, सृष्टि की जननी नारी ।।

(ii)
सादर बंदन राष्ट्र को, आन, बान अरु शान ।
जिसकी पावन भूमि पर, सकल सिद्ध अरमान ।।
सकल सिद्ध अरमान, राष्ट्र है सबसे ऊपर ।
मातु पिता गुरु भ्रात, सकल हैं भारत भू पर ।।
कहत अवध हे नाथ, कभी नहिं होय अनादर ।
देव सरिस है राष्ट्र, झुकाओ सिर को सादर ।।

(iii)
खूब प्रतिष्ठा चाहिए, सबकी होती चाह ।
नैतिकता के साथ ही, चुनो सत्य की राह ।।
चुनो सत्य की राह, परीक्षा देनी होगी ।
रखना होगा भेद, बीच योगी अरु भोगी ।।
कहत अवध हे मीत, निभाओ दिल से निष्ठा ।
सबका रक्खो मान, बढ़ेगी खूब प्रतिष्ठा ।।


correspondent

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