उसमें मोहब्बत की सजावट करने में वक़्त लगा…

डॉ सुलक्षणा अहलावत

ऐ ज़माने! मुझे मोहब्बत करने में वक़्त लगा।
दिलबर अपने को खत लिखने में वक़्त लगा।

इस कद्र डूबी रही मैं पगली उसकी मोहब्बत में,
मुझे उस खुदा की इबादत करने में वक़्त लगा।

बहुत बेरंग थी जिंदगी मेरी उनसे मिलने से पहले,
उसमें मोहब्बत की सजावट करने में वक़्त लगा।

सच में बहुत डरती थी मैं बेवफ़ाई और जुदाई से,
इसी वजह से मुस्कुराहट बिखरने में वक़्त लगा।

मोहब्बत तो उनसे पहली ही नजर में हो गयी थी,
पर ऐ ज़माने तेरी खिलाफत करने में वक़्त लगा।

मदहोश हो गयी मैं उसकी मोहब्बत को पाकर,
उसे पाने के लिए आदत बदलने में वक़्त लगा।

मैं बदली, अंदाज बदला और बदल जिंदगी गयी,
मेरे नसीब को ना करवट बदलने में वक़्त लगा।

हाथ की लकीरें बदली मैंने उसे पाने की खातिर,
सच में सुलक्षणा को किस्मत बदलने में वक़्त लगा।


correspondent

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