कुछ यूँ ही बीत गयी वो रात, पर्दे हया के जब गिराने गया।

रुखसार से नकाब हटाने गया,
चाँद को मैं चाँद दिखाने गया।

वक़्त भी ठहर गया उस पल,
महबूब को गले लगाने गया।

लब खुले नहीं, होंश रहा नहीं,
हाल ए दिल जब बताने गया।

ख्वाबों की मल्लिका निकली,
जब उससे नजर मिलाने गया।

खुद ब खुद कदम बहक गए,
जाम ए इश्क मैं पिलाने गया।

सिमट गए खुद में ही जालिम,
दिल की धड़कनें सुनाने गया।

कुछ यूँ ही बीत गयी वो रात,
पर्दे हया के जब गिराने गया।

“सुलक्षणा” सोचती रह गयी,
जब दास्तां ये लिखवाने गया।


correspondent

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