राजस्थान की खास मिश्री की रोटियां…कैसी बनती है जानने के लिए लॉग इन करे

राजस्थान के ग्रामीण अंचल में बनने वाली खास मिश्री की रोटी।

Facebooktwittergoogle_plusredditpinterestlinkedin

जोधपुर से अतिथि लेखक नरपतसिंह भाटी
आधुनिक फास्ट फूड पिज्जा बर्गर के जमाने में मिश्री की रोटी बीते जमाने की बात बनकर रह गयी हैं। एक समय था जब बचपन में ननिहाल में जाने का मतलब होता था कि नानी मां के हाथो से बनी मीठी मीठी खांड (शक्कर को ऐसी नाम से पुकारते थे ) की कलात्मक कंगूरो के आकार वाली और छोटे छोटे झीणै आकार के खटमटियों से सजी रोटियां जीमने को मिलेगी।
मिश्री की सुस्वाद रोटियां विशेष रूप से पावणों की थाल में बाजोट पर ससुराल में जनाना पक्ष की ओर विशेष तौर पर परोसा जाना वाला आइटम माना जाता था। मिश्री की रोटियां बनाना हर किसी के हाथ की बात नहीं होती थी। कहते भी है कि बुरा स्वाद क्ई बार गोठ की फजीहत भी करवा देता है, अच्छा स्वाद जीमण गोठ का रंग जमा देता है।
पर्दे में परीक्षा का दौर
सुस्वाद मिश्री की रोटियां के साथ अलग अलग क्ई व्यंजन से भरा ढक कर भेजा गया थाल जनाना पक्ष की प्रशंसा की कसीदे भी पढवा सकता था। भोजन जीमने के बाद थाल वापस जाते ही जनाना पक्ष की ओर हाजरिये से एक ही सवाल और उत्सुकता रहती थी कि भोजन के बारे विशेष रूप से मिश्री की रोटियां के बारे में पावणों की क्या राय थी। ये रोटियां और थाल न केवल पर्दानशीन जनाना पक्ष की कलात्मक रूचि के प्रदर्शन, पाकशास्त्र में विशेषज्ञता, मेहमानों के आदर भाव के सुन्दर नमूने होते थे बल्कि मरूवाडी रंगरूडी और मदभरी मनभावन गोठ संस्कृति के प्रतीक भी थे। मिश्री की रोटियां बनाने में मेहनत के साथ भावनात्मक पुट लगा होने के कारण इनका सुस्वाद क्ई गुना बढ़ जाता है।
लोकगीतों में मिश्री की रोटी
लोकगीतों में भी मिश्री की रोटियां के बारे में वर्णन मिलता है। आज काफी दिनों के बाद शाकर की रोटी खाने को मिली, बचपन में नानी मां की स्मृति आंखों के सामने उभर आई और आंख भी भर आई। फास्ट फूड और रेडीमेड के जमाने ने सभी पुराने व्यंजनों को पुराने जमाने की बात बना दिया। अब न तो वो पावणों के थाल की हिस्सा शाकर की रोटी रही, न इसको बनाने वाली वो स्नेहमयी नानी मांएं, न तो स्वाद के पारखी पावणे रहे, न रंगरूडी मदमीठी मनोहारी महफिलें और गोठें, न वो खारभंजणों से सजी बाजोट संस्कृति। न वो मिनख रहे और न ही वो मिनखपणो। रही है तो फास्ट फूड और रेडिमेड भोजन संस्कृति, अब भोजन की बड़ी बड़ी पार्टियां लजीज व्यंजन खिलाने के लिए कम संख्या गिनाने के लिए भी होती है और खड़े खड़े ही काउंटरों पर हाथ रूपी बाजोट पर आधुनिक थालों यानि में खुद ही परोसो और खाओ। मनुहार तो छोडो पहचान में भी समय जाया कौन करे? सब कुछ फास्ट हैं, ऊभे पगै आवो अर ऊभा ऊभा ही खावो, जीमया पछै चलू हैं।

correspondent

DesertTimes.in

DesertTimes.in