मेरे गांव का तालाब, आज भी जिंदा हैै रवायतें

हरसाणी गांव का तालाब

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अतिथि लेखक नरपतसिंह भाटी (खंड विकास अधिकारी, लोहावट)

गुजरात में जल संरक्षण की पद्धतियों के अध्ययन के दौरान लगा कि राजस्थान का हर गांव और उसकी जल स्वालबन की पद्धतियां, जल संसाधन की संरक्षण की विधियां, और जल प्रबंधन कलाएं अपने आप अनूठी हैं, राजस्थान की जल संस्कृति अपने आप सारे विश्व में बेजोड़ है।
यहां के परम्परागत जल स्त्रोत जल स्वालबन और संरक्षण के बेमिसाल नमूने हैं। पर आजकल हम हमारी परम्परागत जल संस्कृति, जल स्त्रोतों, सरोवरों, तालाबों, जल संरक्षण विधियों और पुराने ज्ञान की उपेक्षा कर रहे हैं और उनको भूलते जा रहे हैं। जल के क्षेत्रों में पहले से आत्मनिर्भर गांवों को अब सरकारी जल आपूर्ति वाले सिस्टम पर निर्भर बनाकर अपने पैरों पर ही कुल्हाड़ी मार रहे हैं। तालाबों की आगौर पर अतिक्रमण कर जल को तालाब के आगार में आने से रोक कर तालाबों की हत्या कर बडा़ महापाप का कार्य कर रहे हैं, जल के आवाह क्षेत्र में बेतरतीब और अवैध कॉलोनियों का निर्माण कर जल नालों को तालाबों तक आने से रोक दिये जाने से कई तालाबों को सूखा चुके है हम।
कुओं की मौत तय है
जब तालाब सुखेगे तो आसपास के कुओं की मौत तय है, साथ ही खेती किसानी के काम भी बदहाली तय है, इससे किसानों के जीवन स्तर में गिरावट आनी है, अब इसका एक ही समाधान है कि पुरानी जल संरक्षण विधियों और स्रोतों को पुनर्जीवित किया जावें, उनके लिए संरक्षण के काम में और सर्वेक्षण में अत्याधुनिक तकनीकों को काम में लिया जावे, समाज में जल संस्कृति के प्रति आदर जगाया जाये, जल स्वालबन अभियान के तहत होने वाले कार्यो में जनसहभागिता बढाई जाये, जनता में जल ही जीवन है के प्रति समझदारी पैदा की जाये। बरसात जल संग्रहण के लिए स्कूल, कॉलेज, मैं विद्यार्थियों को पाठ पढ़ाया जाये, तभी भविष्य में जल को लेकर होने वाले विश्व युद्ध से बचा जा सकता है, आज हम जल बचाऐगे और सहजेगे तो आने वाली पीढ़ियों के जीवन को संकट से बचा सकेंगे।
मुझे खुशी है
मुझे खुशी है कि मेरे गांव हरसाणी में अभी तालाबों के प्रति प्रेम और संवेदनशीलता की पुरातन परम्परा जीवित है, माताजी का नाडिया, रोहिडावाला नाडिया, खारियापार, हरसलसागर, तनूजी का पार, आदि आदि। मेरे गांव में पालीवाल समुदाय द्वारा खुदवा गया प्राचीन तालाब अभी भी हजारों लोगों और पशुधन को सुजल नीर अनवरत रूप सदियों से बिना कुछ लिये उपलब्ध कराकर हमें उपकृत कर रहा है। इस हरसलसागर ने कभी अपने उपेक्षा का उलाहना न तो गांव वासियों को दिया है क्योंकि गांववासियों ने भी इसकी उपेक्षा की गुस्ताखी करने की कोशिश भी नहीं की है, इसका दस पंद्रह किलोमीटर में फैला साफ सुथरा आगौर, लगभग दो सौ मीटर का आगार यानि पेटा, इसमें उतराध में तानू के पार के बाद की ऊंची ऊंची थलियो से होकर निकलते सैकड़ों पननाले और गडो वाले मगरे और खेतरपाल जी के मगरे से आते छोटे छोटे अनाम नाले, गांव से आने वाले गंदे पानी को रोकती सुरक्षा दीवार, गोलाकार मजबूत पाल, छलकते पानी को बाहर भेजता इसका सुंदर नेष्टा, पाल पर खड़ी खेजड़ी, कभी सिरस का एक विशाल वटवृक्ष था, जो लंबे समय तक इस हरसलसागर में क्ई बरसों तक सुगंध वातावरण में बिखेरता रहा है, अब शायद पता नहीं क्यों उजड़ गया है, अब उसकी सुगंध नहीं मिलेगी, पर मेरी स्मृति में अभी भी उन फूलों की सुगंध शेष है, अब उसकी जगह किसी ने एक पीपल का पेड़ लगा दिया है,सुंदर गोलाकार रोडो से और मूरडे से बना ओटानुमा चबूतरा जो तालाब के बीच एक टापू बना देता है, एक किनारे पर बनी बांकीदास की छत्री, बीच में लंबे समय तक रहा और अब नहीं दिखाई देने वाला शिवलिंगनुमा कालिया मशा जो तालाब की खूबसूरती में चांद लगाता था,इस पेटा में यानि आगार में बनीं सैकड़ों मीठे पानी की बेरिया, इनमें एक बेरी का नाम भडा था, ये सब मिलकर एक सुंदर तालाब हरसलसागर बनता है, इन सभी की अपनी अलग अलग जिम्मेदारी थी, जो ये तालाब के सभी अंग मिल कर बखूबी निभाकर हरसलसागर को जिंदा रखे हैं और जिंदा रखे हैं हरसाणी की फुटरी और जीवंत जल संस्कृति को भी, तीजडियों की तीज विसर्जन हो, या किसी देहावसान पर होने वाला महास्नान हो, पूरा भरने पर गोविंद महाराज के द्वारा होने वाली पूजा रही हो, या इसकी सफाई के लिए उल्हासित गांववासियों की ल्हास हो,यह तालाब ही सभी जातियों के सामुदायिक और सामाजिक समागम का और समरसता का ह्रदय स्थल और सदियों से साक्षी रहा है, इसने अपने तीर पर सिंह- बकरी, सामंत- गैर सांमत, पशु- पक्षी आदि सभी की बराबरी के भाव से तीरश बुझाई हैं, यह किसी भारी बारिश में छलका भी तो बिना किसी को नुकसान पहुंचाये नेष्टा बहकर खारापार नाडी को बिना दर्प किये लबालब कर गया, कभी अकाल में सुखा भी तो पेटे की बेरिया सरस जल उपलब्ध करती रही है चाहे वो पाल पर बनी चिरजी की बेरी हो, या खतरियो की बेरी हो, खूद सुनने के बाद भी इसकी पेटे में विराजमान बेरिया इसको जीवित रखे रही. सुनने के बाद भी इसकी गाद से बनी ईटों से क्ई मकानात बने, और इसके बिट्टू से क्ई घरों की छतों को जल रोधी बनाता रहा है, यह खुद सुखकर क्ई घरों की छतों को सुखा रखता रहा हैं।
…तो गांव की नजर से उतरा समझों
किसी की मजाल नहीं कि इसके आगौर में शौच कर कर ले और किसी की हिम्मत नहीं कि इसमें नहाने उतर जावे, जो कोई भी उतरा वो गांव की नजर में तो उतरा ही, साथ इसकी लहरों ने भी एक दो को स्वर्ग में भी उतर दिया। यह नहीं होता तो शायद हरसाणी गांव नहीं होता, इसकी वजह से ही गांव का नाम है इस पर हमें नाज है, यही गाव की समृद्धि का राज है, आज मै भी इस तालाब के साथ साथ उन अनाम खुदारों को, उन कामगारों, उन पलीवालों के श्रम की निष्ठा के प्रति अपना श्रद्धा प्रकट करता हुआ उन्हें नमन करता हूँ।

correspondent

DesertTimes.in

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