पंजाब के साहित्यकार भी चाहते हैं, राजस्थानी को मिले संवैधानिक मान्यता

जोधपुर। विश्व की समृद्धतम भाषाओं में शुमार राजस्थानी को संवैधानिक मान्यता की मांग का पंजाब के साहित्यकारों ने भी पुरजोर समर्थन किया है। केंद्रीय पंजाबी लेखक सभा के महासचिव और पंजाबी की साहित्यिक पत्रिका “हुण” के संपादक – कवि सुशील दुसांझ ने राजस्थानी को अत्यंत वैज्ञानिक और समृद्ध भाषा बताते हुए केंद्र सरकार से अतिशीघ्र इसे संविधान की आठवीं अनुसूची में शामिल करने की मांग की है। कथा साहित्यिक एवं सांस्कृतिक संस्थान की ओर से गुरुवार को अंतर्राष्ट्रीय भाषा दिवस के अवसर पर पंजाबी कवियों के सम्मान में आयोजित साहित्य संगोष्ठी एवं सर्वभाषा काव्य संध्या को मुख्य अतिथि के रूप में संबोधित करते हुए उन्होंने कहा कि भूमंडलीकरण की बाजारवादी शक्तियां योजनाबद्ध रूप से हमारी लोक भाषाओँ ,संस्कृतियों और परम्पराओं को नष्ट कर रही है। विश्व की सात हज़ार भाषाओँ में से हर रोज एक भाषा मर रही है। ऐसे में हमें अपनी अस्मिता को बचाये रखने के लिए प्रतिरोध की भूमिका में आने की जरूरत है। समारोह के अध्यक्ष कवि – आलोचक डॉ.रमाकांत शर्मा ने कहा कि पंजाब के कवियों का सूर्य नगरी में आगमन से ऐसा महसूस हो रहा है कि जैसे सूर्य नगरी और स्वर्ण मंदिर का संगम हुआ है। पंजाब के कवियों की चेतना में माटी की गंध और जीवन के इंदरधनुषी रंगों की छटा उभर- उभर आती है। साहित्यकार मीठेश निर्मोही ने कहा कि राजस्थानी का इतिहास एक हज़ार वर्ष पुराना है। पद्मश्री सीताराम लालस द्वारा बारह खण्डों में सम्पादित राजस्थानी- हिंदी शब्द कोश विश्व भाषाओँ में सबसे बड़ा माना जाता है। राजस्थानी के पास प्राचीन एवं आधुनिक साहित्य विपुल मात्रा में उपलब्ध है।  यह भाषा न केवल केंद्रीय साहित्य अकादेमी मान्यता प्राप्त है बल्कि नेपाल सरकार ने इसे संवैधानिक मान्यता दे रखी है। विश्व भर के भाषा शास्त्रियों द्वारा निर्मित सूची में यह 24 वें स्थान पर  है लेकिन दुर्भाग्य देखिये कि हमारी मातृभाषा अपने ही देश में संवैधानिक मान्यता को तरस रही है।


correspondent

Akhil Vyas

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