मैं समा जाऊँ इसकै भीतर या धरती बी फटती कोण्या…एक नई रचना हरियाणवी में

डा.सुलक्षणा अहलावत

मन म्ह उठें झाल समंदर पिया जी डाटै तै डटती कोण्या,
मैं समा जाऊँ इसकै भीतर या धरती बी फटती कोण्या।

काम जलै नै घणी सताई बता कद तलक करूँ मैं समाई,
दिन तै कटज्या स पिया जी पर या रात कटती कोण्या।

किस कै सहारे दिन तोड़ूँ भित्तां म्ह टक्कर मार सर फोड़ूं,
लाख समझा ल्यूँ सूँ मन नै पर बेचैनी या घटती कोण्या।

तन्नै तो करा मेरा ख्याल नहीं आण कै लेई संभाल नहीं,
तेरी यादां की बदली दिल के आसमान तै छंटती कोण्या।

खसम तेरे का पेटा भरग्या, ज्याहैं तै तन्नै छोड़ डिगरग्या,
सासु, नणंद, दुरानी जेठानी ताने मारे बिना हटती कोण्या।

ठा कलम दर्द लिखै जा, “सुलक्षणा” रोज सबक सिखै जा,
गुरु की छाप लगाये बिना उसकी कविताई सजती कोण्या।


correspondent

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