स्कूलों में रेंगता शिक्षा का अधिकार

माधव राठौड़
उदयपुर जिले के ऋषभदेव क्षेत्र में पिता की आर्थिक तंगी के कारण बोर्ड फ़ीस नही दे पाने के कारण छात्रा ने आत्मदाह कर लिया। घटना तो रोज की तरह सामान्य सी लगती है मगर बुद्धिजीवी वर्ग को चिन्तन करने के लिए मजबूर कर देती है कि आखिर 70 साल के बाद भी हम अपने बच्चों को शिक्षा का अधिकार सही ढंग से नहीं दे पाए।
हम अपने को विश्व के विकसित देशों की कतार में तो खड़ा कर देते हैं मगर अंदरूनी हालात कुछ और ही तस्वीर बयाँ करते हैं। बच्चे किसी भी देश के भविष्य की तस्वीर है। ये ऐसे मानवीय संसाधन है जो राष्ट्र की भावी अमूल्य थाती है। जिनके पुष्पित और पल्लवित होने से देश महकेगा। इन सब के लिए जरूरी है कि भावी पीढ़ी को शिक्षा रूपी खाद-पानी से सिंचित करें। महात्मा गाँधी का मानना था कि किसी भी राष्ट्र को विकसित बनाना है तो उसकी पीढ़ी को शिक्षित करो। शिक्षा की इस महत्ता को देखते हुए संविधान निर्माताओं ने इसे अपनी प्राथमिकता पर रखा। इसलिए संविधान में जगह जगह पर इसे व्याख्यायित किया गया। हालांकि सर्वप्रथम गोपाल कृष्ण गोखले ने 1910 में ही भारत में मुफ्त और अनिवार्य प्राथमिक शिक्षा के लिए ब्रिटिश विधान परिषद् के समक्ष आवाज उठाई थी। मगर सही मायने में आजादी के बाद में शिक्षा एक संवैधानिक अधिकार के रूप में हमारे सामने आई। क्योंकि उस समय राज्य के पास इतने आर्थिक संसाधन नहीं थे कि सभी के लिए निःशुल्क शिक्षा की व्यवस्था कर सके इसलिए केवल नीति निर्देशक तत्वों में इसे रखा गया। अनुच्छेद 41 के तहत यह कहा गया कि राज्य अपनी आर्थिक सामर्थ्य और विकास की सीमाओं के भीतर, काम पाने की, शिक्षा पाने के और बेकारी, बुढ़ापा, बीमारी, निःशक्तता तथा अन्य अन्य दशाओं में लोक सहायता पाने के अधिकार को प्राप्त कराने का प्रभावी उपबंध करेगा।
अनु.45 में जो अब संशोधित रूप में कहता है कि मुफ्त और अनिवार्य शिक्षा का नीति के बारे में बताया गया है कि राज्य 6 वर्ष से कम आयु के सभी बच्चों के पूर्व बाल्यकाल की देखरेख और शिक्षा देने का प्रयास करेगा। इसके साथ ही अनु.46 में अनुसूचित जाति व जनजाति एवं दुर्बल वर्ग के लिए शिक्षा और अर्थ के विशेष प्रबंध करने के लिए निर्देश दिए गये हैं। इनके अलावा भी अनु. 29 व 30 में भी शिक्षा व संस्कृति सम्बन्धी अधिकार मूल अधिकार के रूप में वर्णित है। संविधान में नीति निर्देशक तत्व वो आदर्श है जिनको क्रियान्वयन कर सच्चे अर्थों में लोक-कल्याणकारी राज्य की अवधारणा को मूर्त रूप दे सकते है। इसलिए जब भी माननीय सर्वोच्च न्यायलय के सामने शिक्षा को लेकर मुद्दा आया, देश के इस बड़ी अदालत ने हमेशा इसे गम्भीरता से लिया।
अपने मार्गदर्शक जजमेंट यूनी कृष्णन बनाम आंध्र प्रदेश राज्य में सर्वोच्च न्यायलय ने बहुत ही सुंदर व्याख्या करते हुए नीति निर्देशक तत्व से उठाकर शिक्षा को मौलिक अधिकार की श्रेणी में खड़ा किया। अपने एक और दूसरे बड़े निर्णय “मोहनी जैन” में भी न्यायालय ने अभिनिर्धारित किया कि अब समय आ गया है कि राज्य बच्चों के अनिवार्य निः शुल्क शिक्षा को एक मूल अधिकार के रूप में उनके हक को प्रदान करे।
इन दो महत्वपूर्ण निर्णयों की परिणिति के रूप आया अनु. 21-ए। जिसे संविधान के छियासीवें संशोधन अधिनियम, 2002 के तहत हमारे संविधान में अंत: स्‍थापित किया। 2002 में मूल अधिकार तो बन गया मगर उसे क़ानूनी अमलीजामा “नि:शुल्‍क और अनिवार्य बाल शिक्षा अधिनियम, 2009” के तहत पहनाया गया। जिसे राईट टु एजुकेशन (आर.टी.ई.) के नाम से जाना जाता है। जिसमें औपचारिक स्कूल में संतोषजनक और एकसमान गुणवत्‍ता वाली पूर्णकालिक प्रांरभिक शिक्षा को प्रत्‍येक बच्‍चे का मूल अधिकार माना गया है।
अनुच्‍छेद 21-क के तहत आरटीई अधिनियम 1 अप्रैल, 2010 को लागू हुआ। जिसमें ‘नि:शुल्‍क शिक्षा’ का तात्‍पर्य यह है कि कोई बच्‍चा जो किसी किस्‍म की फीस या प्रभार या व्‍यय देने में असमर्थित है उसके मात्र अर्थाभाव के कारण प्रारंभिक शिक्षा जारी रखने और पूरा करने से रोका नही जायेगा। ‘अनिवार्य शिक्षा’ के अन्तर्गत उचित सरकार और स्‍थानीय प्राधिकारियों पर 6-14 आयु समूह के सभी बच्‍चों को प्रवेश, उपस्थिति और प्रारंभिक शिक्षा को पूरा करने का प्रावधान करने और सुनिश्चित करने की बाध्‍यता रखती है।
इस अधिनियम के लागू होने से 6 से 14 वर्ष तक के प्रत्येक बच्चे को अपने नजदीकी विद्यालय में निःशुल्क तथा अनिवार्य प्राथमिक शिक्षा पाने का कानूनी अधिकार मिल गया है। इस अधिनियम की खास बात यह है कि गरीब परिवार के वे बच्चे, जो प्राथमिक शिक्षा से वंचित हैं, के लिए निजी विद्यालयों में 25 प्रतिशत आरक्षण का प्रावधान रखा गया है। शिक्षा का अधिकार कानून लागू होने से 6 से 14 वर्ष तक के बच्चों को न तो स्कूल फीस, न ही स्कूल ड्रेस, किताबें, परिवहन, मीड-डे मील जैसी चीजों पर ही खर्च करना होगा। बच्चों को न तो अगली क्लास में पहुँचने से रोका जाएगा, न ही निकाला जाएगा। उनके लिए बोर्ड परीक्षा पास करना भी अनिवार्य नहीं होगा। इसके तहत कोई भी स्कूल बच्चों को प्रवेश देने से इंकार भी नहीं कर सकेगा। हर 60:2 के अनुपात में बच्चों को पढ़ाने के लिए कम से कम दो प्रशिक्षित अध्यापक होंगे। तीन साल के अंदर स्कूलों के संसाधनों को सुधारा जाएगा। तीन किलोमीटर के क्षेत्र में एक विद्यालय होगा । इस कानून के लागू करने पर खर्च को केंद्र व राज्य पर क्रमश 55:45 के हिसाब से उठाने के प्रवाधान रखे गये।
शिक्षा के अधिकार को मूल अधिकार का दर्जा देने के साथ साथ अनु.51ए में मूल कर्त्तव्यों में अभिभावकों पर भी कर्त्तव्य अधिरोपित किया गया कि वे अपने बच्चों को शिक्षित करे । अधिनियम में तो बच्चों के माता-पिता या संरक्षक द्वारा दायित्व के उल्लंघन करने पर अर्थदण्ड का भी प्रावधान भी है।
निश्चित रूप से यह अधिनियम भारतीय राष्ट्र एवं समाज को एक विकसित एवं शिक्षित राष्ट्र के रूप में परिवर्तित करने का प्रयास जान पड़ता है। अगर सही तरीके के इस अधिनियम का क्रियान्वन किया जाये तो हमारे पूर्व राष्ट्रपति एपीजे अब्दुल कलाम के विजन 2020 के तहत नॉलेज सोसायटी का सपना साकार हो सकता है।
मगर अफ़सोस इस बात का है हमारी अभिजात्य मानसिकता यह है कि बच्चों को सरकारी स्कूल में नहीं पढ़ाकर प्राइवेट स्कूल में पढ़ाया जाये ताकि गरीब बच्चों से अलग रखा जाये। इस वर्गभेद की मानसिकता को तोड़ने के लिए यह यह कानून कारगर है। बड़ी बिडम्बना की बात है कि सरकारी स्कूलों में वो अध्यापक है जो राज्य स्तर की कड़ी प्रतियोगता पास कर आये हुए है। और उधर प्राइवेट स्कूल में ठीक उल्टा है मगर फिर भी हमारा प्राइवेट स्कूलों के प्रति मोह बरकरार है। जहाँ यह हकीकत है कि छठीं कक्षा में पढ़ने वाले बच्चों को इंग्लिश में खिचड़ी हो जाती है और उधर इंग्लिश के चक्कर में हिंदी की बिंदी भी भूल जाते है। सरकारी स्कूलों में भी पढ़ाई का स्तर सुधारने की बजाय लगातार बिगड़ रहा है। क्योंकि उनका ध्यान सिर्फ नामांकन, मिड दे मिल, चुनाव और ट्रान्सफर में लगा हुआ रहता है, इन सबकी वजह से पढाई की जो गुणवत्ता होनी चाहिए वो नजरअंदाज हो जाती है और पूरा साल गौण मुद्दों पर बीत जाता है। इसलिए जरूरी है कि हम उन मुख्य मुद्दों पर ध्यान देने के लिए शिक्षा नीति में आमूलचूल परिवर्तन कर शिक्षा के अधिकार को वास्तविक रूप से जरुरतमंदों तक पहुँचाये। शिक्षा, शिक्षक और शिक्षार्थी को महत्व दिया जाये। अभी पिछले वर्ष इलाहाबाद कोर्ट ने सरकारी स्कूलों के हालात सुधारने के लिए जो अनिवार्यता कर दी थी, उसको भी सही तरीके से क्रियांविंत करने का प्रयास हो। क्योंकि अमेरिका और जापान में आज भी सरकारी स्कूल में पढ़ाने का प्रचलन है। वहाँ शिक्षा को बाजार में व्यवसाय बनाकर नही छोड़ा गया बल्कि आज भी राष्ट्र के प्रमुख एजेंडों में से शिक्षा एक महत्वपूर्ण घटक है। अतःवर्तमान परिपेक्ष्य में इसकी और ध्यान देने की महती आवश्यकता है ताकि अर्थाभाव के कारण कोई भी शिक्षा जैसे मूल अधिकार से वंचित नही रह पाए और न ही हमारी नीति में इतना झोल हो कि शिक्षा पाने के अवसरों में भी मनमानी और विभेदकारी नीति के कारण हजारों बच्चों को वंचित होना पड़े। तभी सविंधान के उन प्रतिमानों को हकीकत के यथार्थ धरातल पर उकेर सकेंगे जिन्हें सविंधान की मोटी किताब में उज्ज्वल व सुनहरे भविष्य की आस में उकेरा गया था


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DesertTimes.in

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