कहानी : अधूरा वजूद… ये कहानी उस हरेक दम्पती को समर्पित, जिनका वजूद पूरा होकर भी अधूरा हैं!

माधव राठौड़

उसने विवाह के ठीक पांच साल बाद मुझसे कांटेक्ट किया, उस दिन खूब हंस-हंस कर बाते की थी उसने, मगर दिल के किसी कोने में दबा, वो दर्द न जाने कब हँसी के साथ उभरा था, जिसे मैंने पहले ही दिन पकड़ लिया था। उसके बाद हमारी अक्सर लम्बी बातें होने लगी, वो खूब हँस कर बात करती थी मगर वो दर्द छिपाये छिपता नही था।

सुनो! तुम जिन्दगी के किसी कोने से खुश नही हो?
मेरा हर बार ये सवाल होता और वो हँस के नकार देती। वो भीतर ही भीतर अजीब कशमकश के साथ घुट रही थी। उसे दर्द शेयर के लिए कोई चाहिए था, शायद इसलिए उसने फिर से सम्पर्क किया।
“सुखमय वैवाहिक जीवन की विवाहिता एक गैर मर्द से क्यों बात करेगी”
मै वजह जानने की कोशिश करता रहा।
“एक बात कहूँ” ये उसका तकिया कलाम था।
हाँ,बोलो
मै सर्द रात के सन्नाटे की गम्भीरता में समझ चुका था कि उसके भावों का बांध टूटेगा ,कुछ पिघलेगा, कुछ बहेगा जो कई दिनों से भीतर से उमड़ रहा है।
“मै कभी माँ नही बन सकती” उसने इतने सहज सरल व तेज गति से अपना राज खोल दिया, जिसके लिए मै बिलकुल तैयार नही था। मेरे कयास कुछ और ही थे, आखिर पुरुष मन जो ठहरा।
क्या उनमे कोई कमी है?
नही
तो? आप में? मैंने धडकते दिल से पूछा
नही, न वो नपुंसक है,न मै बाँझ।
अब मै चुप था।
वो रुक के बोली “हम आपस में…”
ओह! मै अब समझ चुका था, मगर मेरे पास कोई जवाब, कोई रिएक्शन नही था इस वक्त।
कभी कभी हमारे सामने प्रकृति ऐसी परिस्थिति खड़ी कर देती है कि एक ही झटके में सारी बौद्धिक हेकड़ी उतर जाती है, निरुपाय और निरुतर से रह जाते है। फिर भी अपने को समेट कर बोला ” “प्लीज हिमांशी !
ऐसी भी कोई मजाक होती है क्या?”
माधव,ये मजाक तो सच में मेरे साथ हुई है। मेरे पास खुबसूरत और प्यार करने वाला पति है, जिसके पास 25 लाख के पैकेज की नौकरी और 3 बी.एच.के. का प्यारा घर है जिसमे सास ससुर का प्यार, ननद और जेठानी की खट्टी मिठ्ठी नोंक झोक है।
मुझे वैवाहिक जीवन की वो सब खुशियाँ मिली जिसके सपने एक कुंआरी लड़की हमेशा बुनती है, मगर ये अधूरापन मुझे अंदर ही अंदर खाये जा रहा है।
वो दिनभर ऑफिस व नौकरी में बिजी रहते है या ऑफिस के काम से शहर दर शहर टूर या फिर देर रात दोस्तों के साथ पार्टियाँ की भीड़ में खुद को भूला देते है, मगर इधर मै एक स्त्री ठहरी, जो कभी सास की हर महीने पे उठती निगाहें तो कभी मायके में माँ के उम्मीद भरे सवालों से जूझती रहती हूँ। छोटी बहन मनु और भाभी भी छेड़ती है कि “फॅमिली प्लान ही करते रहोगे या हमें मौसी या मामी भी बनाओगे?”
“तुम सुन रहे हो ना?”
हाँ,हाँ, तुम बोलती जाओ।
ये सब द्विअर्थी सवाल, ये उम्मीद भरी नजरें, कुछ लोगों के इशारे अंदर से रुला देते हैं।
सबसे ज्यादा परेशान होती हूँ ,अपने पति के लिए।
डॉक्टर ने कहा तब से वो अंदर ही अंदर खोया रहता है मुझे उसकी फीकी मुस्कान दर्द देती है। मै रोना चाहती हूँ मगर उसके सामने रोकर उसे और ज्यादा दर्द नही देना चाहती। मुझे पता है कि पौरुषत्व के अहम पे चोट कितनी गहरी लगती है, मगर ये इनका दोष नही है, किस किस को कैसे समझाऊँ?
माधव!
कभी कभी तो इस घुटन की वजह से छाती में जोर का दर्द होने से मेरी साँस तक रुक जाती है, मगर मेरा दर्द किसे बताऊँ, मै किसी के कंधे पे सिर रख जी भर के रोना चाहती हूँ।
वो चुप हो गई, मगर उसके सुबकने की आवाज मुझे और मेरे कमरे में पसरी ख़ामोशी को तोड़ रही थी।
मैंने दार्शनिकता का सहारा लेकर कुछ कहना चाहा ” माँ बनना जरुरी है क्या? दुनिया में कई स्त्रियाँ है जो कभी माँ नही बन सकती, कईयों के और भी दुःख दर्द है, फिर भी वे जी रही है, आपके तो भगवान की सब मेहरबानी है, सिवाय इसके।
वो फीकी सी मुस्कान के साथ बोली ” छोडो , तुम नही समझोगे,
“एक विवाहिता के लिए माँ बनना ही उसकी सम्पूर्ण सार्थकता है। मेरा माँ बनना सिर्फ मेरा ही सुखद एहसास नही हैं। मेरे माँ बनने से कई रिश्तों को नाम मिलता है, कोई पिता बनता है तो कोई दादा, नानी भुआ, उन सब लोगों को ख़ुशी देना चाहती हूँ, मै सिर्फ अपने लिए माँ नही बनना चाहती।
“सुनो! तुम मुझ पर एक एहसान करोगे” वो कह कर चुप हो गई,
मगर मेरे जेहन में अजीब सा सवाल खड़ा कर गई। “पता नही कैसा काम, कैसी मदद, कैसा एहसान कहीं वो …”
मै उसे सुलझाने के चक्कर में उलझ गया।
हेल्लो, क्या हुआ??
कुछ नही, पर देखो हिमांशी! हमारी दोस्ती कॉलेज समय से आज तक पवित्र रही, तुम शादीशुदा हो, कल किसी को पता चल गया तो लोग क्या कहेंगे, तुम तो समझ रही हो ना”।
ओह माधव ! तुम भी कितने कमजोर निकले, मैंने तुमसे ये उम्मीद नही की थी कि तुम इस तरह से सोचोगे, मै अपने स्वार्थ के लिए इतनी भी नही गिरूंगी यार।
“तो क्या चाहती हो” उसके उलाहने के साथ ही मेरी पुरुष सोच और भाषा की सीमा खत्म हो चुकी थी।
मै अपने पति और परिवार को किसी भी कीमत पे खुशियाँ देना चाहती हूँ, इसके लिए मैंने उदयपुर की एक लेडी डॉक्टर से आई.वी.एफ. टेकनीक के बारे में बात की हैं।
बस मुझे कुछ पैसे और भरोसेमंद आदमी की जरूरत है।
तो तुम अपने पति को साथ में क्यों नही ले जाती ?
नही माधव, वो आदमी इस तरीके की ख़ुशी और बच्चे को कभी स्वीकार नही कर पायेगा, वो घुट घुट करके मर जायेगा। ये राज में उसके सामने कभी नही खोलूंगी क्योंकि ये मेरे पति और आनेवाले बच्चे की जिन्दगी में भूकम्प ला सकता है।
“हाँ वो तो ठीक है, पर मेरे पास तो पैसे..”
वो बीच ही बोल पड़ी ” मै यहाँ नाथद्वारा में जानकार के पास गहने रख पैसे ले आऊँगी,
तुम तो बस जोधपुर से उदयपुर आ सकते हो क्या?”
कब आना होगा?
अभी तो महीने भर ट्रीटमेंट चलेगा, पीरियड्स के बाद ही डॉ. आगे तय करेगी, तब आपको एक बार आना होगा।
कुछ_दिन_बाद
हेल्लो हिमांशी
हाँ,माधव
कैसा चल रहा है?
ठीक है, ट्रीटमेंट शुरू हो गया हैं, कुछ इंजेक्शन दिए है, साथ में दवाई भी, मगर बहुत भारी है शरीर पे साइड इफेक्ट्स दिख रहा है चेहरे पे पिम्पल्स हो गये है,
कुछ भी खाओ, जी मचलता रहता है, पूरा शरीर में अजीब सा फील होता है।
“कोई नही, सब ठीक हो जायेगा, विश्वास रखो
सुनो,
तुम्हारे बाड़मेर में राणी भटियाणी जी का मन्दिर है ना,
कहते वहां लोगो की मन्नतें पूरी होती हैं।
हाँ, कहते तो है।
मेरी मन्नत पूरी होगी तो मै भी आऊँगी।
ठीक है, श्रीनाथ जी सब अच्छा करेंगे
कुछ_दिन_बाद
हेल्लो
हाँ बोलो
क्या कर रहे हो?
कुछ नही, पढ़ रहा था।
क्या पढ़ रहे थे?
धर्मवीर भारती का उपन्यास “गुनाहों के देवता पढ़ रहा था।
तुम कुछ परेशान सी लग रही हो?
नही, कुछ भी नही, बस यूँ ही ।
हिमांशी ! कम से कम मुझसे तो छिपाया मत करो
हम्म्म…
बोलो भी..क्या
एक बात कहूँ?
नही, मत कहो
मै तुम्हे परेशान करती हूँ ना ?
अरे नही, मै तो मजाक कर रहा था, तुम बोलो?
अब कभी परेशान नही करूँगी
क्यों?
कुछ नहीं, महीना खत्म हो गया और उम्मीदे भी
क्या कह रही हो? मै समझा नही।
माधव! तुम उदयपुर मत आना
क्यों ?
डॉ. ने मना कर दिया है, ट्रीटमेंट फ़ैल हो गया है तो इस बार भी कन्सीव नही हो पायेगा……
वो रो रही थी, मै चुप था, मेरी गली और शहर सो चुके थे, मेरे पास निःश्वास के सिवाय कुछ नही था।


correspondent

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