लोक लहरियों पर थिरकता है आस्था का महासागर

उदयपुर। दुनिया भर में बेणेश्वर एक ऎसा स्थान है जो अपनी कई अलौकिक विलक्षणताओं भरे इतिहास की वजह से खासी पहचान रखता है। यह ने केवल एक टापू के रूप में बल्कि बेणेश्वर लाखों लोगों के हृदय में अंकित है। राजस्थान के दक्षिणांचल में माही, सोम और जाखम नदियों के पावन जल से घिरा बेणेश्वर टापू लोक आस्थाओं का वह महातीर्थ है जहाँ हर साल माघ में एकादशी से लेकर दस दिन का विराट मेला भरता है जिसमें कई लाख लोगों की आवाजाही के कारण इसे इस अंचल के कुंभ की ही तरह मान्यता प्राप्त है।
बेणेश्वर धाम बांसवाड़ा जिला मुख्यालय से 45 किलोमीटर दूर अवस्थित है जहाँ माघ शुक्ल एकादशी अर्थात 7 फरवरी, मंगलवार से दस दिन का विशाल मेला भरेगा। मुख्य मेला माघ पूर्णिमा 10 फरवरी को भरेगा। मेले का समापन पंचमी 15 फरवरी को होगा।मेले में वागड़ अंचल से तो लाखों लोग भाग लेते ही हैं, देश के विभिन्न हिस्सों ख़ासकर मध्यप्रदेश और गुजरात जैसे पड़ोसी राज्यों से भी बड़ी तादाद में मेलार्थी भाग लेते हैं। इसमें पवित्र जल संगम तीर्थ में स्नान, अस्थि विसर्जन, देव दर्शन, मेला बाजारों से खरीदारी, मनोरंजन आदि के साथ वह सब कुछ होता है जो देश के बड़े-बड़े मेलों में होता है। करीब तीन सौ वर्ष से संत मावजी महाराज और बेणेश्वर की गाथाएं सुनाने वाले इस मेले में लोक संस्कृति, धार्मिक, सामाजिक और सांस्कृतिक परंपराओं तथा दक्षिणांचलीय पुरातन व सम सामयिक लोक लहरियों का जीवन्त प्रतिदर्श देखने को मिलता है। जिसे दक्षिणांचल की सम्पूर्ण थाह पानी हो, उसके लिए बेणेश्वर मेला, उसकी परंपराएं और रोचक गाथाएं अपने आप में काफी हैं। संत मावजी के अनुयायियों और भक्तों के लिए बेणेश्वर दूसरे सारे तीर्थों से बढ़कर है जहाँ मानते हैं कि मेले में भागीदारी से साल भर सुकून का अहसास होता रहता है। यही कारण है कि परिवार सहित लोग यहाँ आते हैं और प्रकृति, नदियों, देव धामों और जन गंगा के बीच अपने आपको पाकर आनंद का अनुभव करते हैं। जय-जय व्हाला मावजी, जय-जय-जय बेणेश्वर धाम।


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DesertTimes.in

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