…एक आवाज और सात समंदर पार से आ जाते मेहमान

– एक जादुई आवाज जो यादगार बना देती है मरू उत्सव को
जैसलमेर। नायाब नक़्क़ाशीदार जाली झरोखों वाली हवेलियों, 99 बुर्जों वाले अजेय-अभेद्य दुर्ग सोनार किले और स्वर्णिम रश्मियों की अशर्फ़ियाँ लुटाने वाले रेतीले समन्दर को अपने दामन में समेटे ऐतिहासिक स्वर्ण नगरी जैसलमेर दुल्हन सी सज संवर कर तैयार है। मरू महोत्सव की मेजबानी करने के लिए गोल्डन सिटी की सरजमीं पे क़दम रखने वाले मेहमान सैलानियों को “केसरिया बालम आओ नी पधारौ म्हारै देस… की तर्ज़ पर खुश आमदीद कहने के लिए बहोत बेताब है इस शहर का चप्पा चप्पा।
07 फ़रवरी 1979 को आग़ाज़ हुआ था मरु महोत्सव का। 38 बरसों के इस सफ़र में अब तक 28 मर्तबा डेज़र्ट फेस्टिवल की मेजबानी करने का कीर्तिमान स्थापित किया है जोधपुर के ज़फ़र ख़ान सिन्धी ने। फ़रवरी 1989 शहीद पूनम सिंह स्टेडियम में आयोजित मरू महोत्सव के उदघाटन समारोह में पहली बार जैसलमेर ज़फ़र की शीरीं सी मख़मली आवाज़ से रूबरू हुआ। वो नाता ऐसा जुड़ा कि आज 38वें मरू मेले की एंकरिंग करने के लिए 28वीं बार ज़फ़र को आमंत्रित किया गया है। मरू उत्सव का आगाज एक बार फिर जफर की आवाज में और कहेगा पधारो म्हारे देस।


correspondent

Akhil Vyas

Akhil Vyas

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