गुरु से बड़ा कोई मौला नहीं

डॉ. सुलक्षणा अहलावत

लाज का घूँघट मैंने कभी खोला नहीं,
ऊँचा एक भी लफ्ज कभी बोला नहीं।

दुःख और दर्द को सदा हँस कर झेला,
चंद सिक्कों के लिए ईमान डोला नहीं।

मर्यादा की लक्ष्मण रेखा लांघी नहीं,
सुंदरता से मोहब्बत को तोला नहीं।

रिश्तों की अहमियत को जाना मैंने,
नफरत का ज़हर उनमें घोला नहीं।

बेईमान मन को काबू रखा सदा मैंने,
सच है मन किसी का भी भोला नहीं।

मन के भावों को कविताओं में ढ़ाला,
सुलक्षणा गुरु से बड़ा कोई मौला नहीं।


correspondent

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