महिला-पुरुष समान दर्जे के, भेदभाव नहीं बरतें

राजसमन्द। भारतीय संस्कृति में महिला को पुर्ण से ही समानता का दर्जा प्राप्त है। आज भी सरकार महिला सशक्तिकरण की शिक्षा में प्रेरणा के साथ काम कर रही है। ऎसे में दोनों में अन्तर भेद को समाप्त करना आज भी आवश्यक है। और पुरुष की तुलना में महिला का गिरता लिंगानुपात चिन्तन का विषय है। सभी को बालक-बालिका समान है का बराबरी का दर्जा देना जरूरी है। यह विचार विभिन्न वक्ताओं ने मंगलवार को महिला अधिकारिता, महिला एवं बाल विकास की ओर से नगरपरिषद के सभागार में जेण्डर संवेदनशीलता ः संवेदी बजट विषय पर आयोजित एक दिवसीय आमुखीकरण कार्यशाला में व्यक्त किए। कार्यशाला में वक्ताओं ने कहा कि आज भी महिलाओं बच्चियों को स्वतन्त्रता की दृष्टि से भेदभाव किया जाना सामने आता है। बालिकाओं की जन्मदर कम होना चिन्ता का विषय है। जब महिला पुरूष एक गाड़ी के दो पहिये हैं तो महिलाओं एवं बालिकाओं को समान नजरिये से देखा जाना चाहिए और वे सभी सुविधाएं बालिकाओं को सुलभ करायी जानी चाहिए जो एक बालक को होती है। आज के परिवेश में बात की जाए तो आज महिलाएं सभी क्षेत्रों में पुरूषों से कन्धा से कन्धा मिलाकर आगे बढ़ रही है। चाहे चिकित्सकीय, वैज्ञानिकी, सेवा, शिक्षा आदि हो सभी में बेहतर प्रदर्शन एवं श्रम सेवा कर रही है। ऎसे में इनमें भेद करना परिवार एवं देश हित में नहीं कहा जा सकता। कार्यशाला में बताया गया कि महिला अधिकारिता का बजट प्रपत्र 11 के अनुसार बनाया जाना चाहिए। महिलाओं को सरकार की तरफ से दी जा रही सभी आरक्षण व्यवस्थाओं में प्राथमिकता के अनुसार उन्हें हर क्षेत्र में कार्य करने का अवसर प्रदान किया जाना चाहिए।


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