श्री सांवलिया सेठ में जन-जन का अटूट विश्वास

चित्तौड़गढ़. जिले में श्री साँवलियाजी का मंदिर अपने श्रद्धालुओं के लिए आराधना, आत्मिक शांति, सुरक्षा, सौहार्द्र, परस्पर भाईचारे का अनुपम धार्मिक स्थल है। यह अपने भक्तों के जीवन की सुखद यात्रा के लिए ज्ञान एवं आत्मकल्याण का अलौकिक केन्द्र है। श्री साँवलिया सेठ में जन-जन का अटूट विश्वास है। उनका ईश्वरीय सत्ता में यह विश्वास ही प्रेम, आत्मिक-शांति-सुरक्षा तथा आस्था का स्रोत है। जब-जब मनुष्य आस्था और विश्वास से दूर होता जाता ह,ै तो वह अन्धकार की ओर अग्रसर होने लगता है। इसलिए जिस सत्ता में उसे विश्वास है, वहाँ प्रेम और शांति की प्रतीति है। भक्त गण ऐसी ही शांति के लिए श्री साँवलियाजी के द्वार पर खींचे चले आते हैं। ऐसी आस्था, विश्वास तथा आत्मिक प्रसन्नता किसी डर या व्याकुलता से नहीं बल्कि प्रभु प्रेम व समर्पण भाव से ही उनके हृदय पटल पर उतरती है। मंदिर मात्र प्रार्थना के स्थान ही नहीं, वे सदा से ऊर्जा के केन्द्र भी रहे हैं। इसलिए अपने श्रद्धालु को अपना अहंकार चरण पादुकाओं की तरह बाहर छोड़कर मंदिर में प्रवेश करना होता है। आजकल लोग पल भर को बैठे नहीं कि उठ कर चल देते हैं। मंदिर में बैठने का मतलब बैठना नहीं बल्कि ऊर्जा ग्रहण करना है। केदारनाथ, सोमनाथ, श्रीनाथजी की तरह श्री साँवलियाजी मंदिर भी ऊर्जा का अद्भुत केन्द्र है, जहाँ श्रद्धालु दैविक ऊर्जाओं से आपूरित होते हैं।इस मंदिर की संरचना वास्तु शिल्प व वैज्ञानिक आधार वाली है। इससे मंदिर की सीमाओं में मौजूद सकारात्मक शक्ति यां उनके शरीर और मस्तिष्क में प्रवेश करती हैं। अतः नए काम को शुरु करने से पहले या बाद मंदिर में अवश्य दर्शन करने हेतु कहा गया है। मंदिर के वातावरण में मौजूद सकारात्मक ऊर्जा मन-मस्तिष्क को स्वच्छ और सजीव कर सही दिशा की ओर अग्रसर करती है। मंदिरों का निर्माण पूजा या दान के साथ ऊर्जा सृजन के लिए किया जाता हैं।जिस प्रकार नीले आकाश के नीचे परमात्मा की तरह-तरह की विचित्रताएँ और छटाएँ हैं, जल है, जीवन है, जिसे प्रभु ने साधा हुआ है। उसी अनुरुप श्री साँवलियाजी का यह विशाल मंदिर परमपिता परमात्मा को समर्पित है। श्री साँवलियाजी अपने भक्तों को भक्ति मय तथा लोकोपयोगी बनाए रखने के लिए संतुलित किए हुए है। श्री साँवलियाजी का यह मंदिर विशाल गुम्बदों, देव मूर्तियों, गवाक्षों, खूबसूरत कलाकृतियों, मेहराबों वाला ही नहीं वरन् हमारी प्राचीन भारतीय संस्कृति का जीवन्त प्रतिनिधित्व करने वाले इस स्तूप में गर्भगृह, परिक्रमा, मण्डोवर, शिखर, कलश आदि उपांगों में भक्त अपने देवत्व के दर्शन करता है। यह पावन स्थल परमपिता परमात्मा का मानव कल्याण के लिए अप्रतिम उपहार है।विज्ञान ने जिस तेजी से भौतिक उन्नति का साम्राज्य खड़ा किया है, वह विगत चार हजार वर्षों में भी नहीं हो पाया था। आटोमोबाइल्स, एयरलाईन्स, लग्जरी जहाज, स्पेस शटल तथा बुलेट ट्रेन से लगाकर मिसाईल तक नानाविध आयाम तय किए गए हैं। विज्ञान ने लौकिक यात्रा के लिए खालीपन को एक सीमा तक दूर तो किया है, परन्तु मनुष्य अपनी नियति तय नहीं कर पाया है। अपने जीवन की कालावधि में उसने वृद्धि अवश्य करली है, पर वह नश्वरता की समझ विकसित नहीं कर पाया । जेनेटिक इंजीनियरिंग के माध्यम से आने वाले युग में चाहे मनुष्य बेहत्तर जीन्स और सुपरमेन भी बना लेगा परन्तु बड़े से बड़े आविष्कारों में आध्यात्मिक अनुभूति को जोड़े बिना मानव-मात्र को शांति और प्रेम की अनुभूति नहीं हो पाएगी। श्रद्धालु यह कहते नहीं अघाते हैं कि हमारे प्राचीन ऋषियों ने हजारों वर्ष पहले अपने में ईश्वरीय चेतना को विकसित किया। मानव कल्याण के लिए जाग्रत मंदिरों में ईश्वरीय सत्ता का हमारी पीढ़ियों को मजबूत आधार मिला। मंदिर में आने वाला हर कोई श्रद्धालु महसूस करता है कि मनुष्यों के आन्तरिक मेल की सफाई का मंदिर सर्वाधिक प्रभावशाली माध्यम है। अन्य देवालयों के समान यह मंदिर भी नदी का वह मुहाना ह,ै जहाँ अपने देव तक पहुँच बनाई जाती है। यही नहीं यह वह द्वार हैं जो हमें विश्व के तमाम धार्मिक परम्पराओं को जानने और समझने का मार्ग दिखलाता है। अपनी अन्तर्रात्मा को परमात्मा में मिलाने की भूख मंदिर के माध्यम से बेहत्तर रूप से पूरी की जा सकती है। राष्ट्र उन्नति के लिए आज आध्यात्मिक प्रभुता की महती आवश्यकता है। लोग धन की लोलुपता में धन के असली प्रयोजन व मूल्यों से भटकते जा रहे हैं, जबकि परमतत्व के निकट रहना ही सार्थकता है। मंदिर आध्यात्मिक मूल्यों की रक्षा करते हैं तथा हमारा अहं भाव विगलित करने में सहायक होते हैं।गुजरात स्थित सोमनाथ मंदिर और पुरी (ओडीसा) के भगवान जगन्नाथ मंदिर की ही तरह नागर शैली की उप शैली में यह मंदिर निर्मित हो रहा है। श्री साँवलियाजी धाम अब अत्याधुनिक यन्त्रों, इलेक्ट्रिक उपकरणों, नवीन तकनीकों व विधियों का उपयोग करने वाले हाई-टेक स्थल के रूप में तेजी से नई करवट ले रहा है। इस मंदिर में राजस्थान के धौलपुर जिले के बंशी पहाड़पुर के बादामी रंग के पाषाण, शिलाखण्डों कोे जिस खूबसूरती से यहाँ तराशा और जोड़ा गया है, मंदिर का समूचा शिल्प संसार सजीव हो उठा है। मंदिर के पुरूद्धार कार्य को लगभग 13 वर्ष पूरे हो रहे हैं। इस मंदिर में प्राचीन मंदिरों की पृष्ठभूमि वाली शिल्प शैली में कुछ नवीनताओं को मिश्रित करते हुए उसी आध्यात्म सोच को आगे बढ़ाया गया है। अब यह मंदिर देश का एक विशिष्ट आस्था स्थल हो गया है। श्री साँवलियाजी में देवझूलनी एकादशी का महोत्सव चल रहा है जिसमें लाखों श्रद्धालु यहाँ दर्शनार्थ उपस्थित हुए हैं।


correspondent

DesertTimes.in

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