देवझूलनी एकादशी पर विशेष

पब्लिक  रिपोर्टर नटवर त्रिपाठी

मण्डफिया (सांवलियाजी)। मण्डफिया (साँवलियाजी) के बुजुर्गों की माने तो देवझूलनी का मेला सन् 1952 में प्रारम्भ हुआ परन्तु इसका व्यवस्थित स्वरूप वर्ष 1957 में गठित प्रबन्ध कारिणी कमेटी के द्वारा नियोजित ढंग से 1956-57 से होने लगा। 85 वर्षीय देवा बा गूजर कहते हैं कि पहले देवझुलनी एकादशी पर 5-25 लोग इकट्ठे होते थे। भगवान का बेवाण लकड़ी का था और गाँव के अन्य चारों मंदिरों के लकड़ी के बेवाण में अपने-अपने ठाकुरजी को साथ-साथ झूलाने ले जाते थे। देवझूलनी समारोह में पड़ोस के गाँवो के भी बेवाण साँवरिया एनिकट में झूलने आते रहे हैं। मेले की बढ़ोतरी 1964-65 से होनी शुरु हुई। आजादी से पहले यह गांव सिन्धिया राज्य में था। सिन्धिया के कामदार घराने के गेंदालाल शर्मा (86) ने बताया कि मंदिर की ज्यों-ज्यों ख्याति बढ़ी तो सत्तर के दशक आते-आते जलझूलनी एकादशी के मेले का काफी विस्तार हो गया। यही कोई तब श्रद्धालुओं की संख्या एक लाख पार करने एवं मनोरथ मनाने की बात सामने आई। मेला कमेटी के 30 वर्ष अध्यक्ष रहे मदनलाल जैन एडवोकैट बताते हैं कि उस समय मेले में विभिन्न प्रकार के सांस्कृतिक कार्यक्रम, राजकीय विभागों की प्रदर्शनियां और चलचित्र आदि के मनोरंजन के कार्यक्रम सुचारू रूप से प्रारंभ हो गए थे। मेले में मध्यप्रदेश और दक्षिणी राजस्थान से आने वाले दर्शनार्थियों की बहुतायत थी। एम.एल. बंसल बताते हैं कि झलझूलनी एकादशी का मेला कोई 60-65 वर्ष पूर्व मंदिर पर कलश चढ़ाये तब से प्रारम्भ हुआ। आम लोगों की श्रद्धा की बात करें तो 60 के दशक पहले कपासन के लोग मेले के दौरान दिन में ढ़ोल बजाते थे और रात्रि में माच का खेल किया करते थे। वे बिन बुलाये आते थे, अब भी आते हैं और बदले में कोई पैसे-कौड़ी का आग्रह नहीं करते हैं। नीमच के सुभाष बैंड का भी यही हाल है, तब भी आता है और अब भी उसकी मौजूदगी हर मेले में देखी जा सकती है। यही परम्परा रही। यही हाल मेले पर आने वाले दर्जनों घोड़े लाने वालों का है, वे आते हैं और मंदिर में बेशुमार सैलाब के मध्य घोड़ियों के अजब-गजब नृत्य और करतब दिखाते हैं। पास के गाँव के रेबारी सजाधजा कर अपने ऊँट शोभा यात्रा और रथ यात्रा के लिए लाते हैं। और हाथी भी। वे उत्साह पूर्वक श्रद्धाभाव से आते हैं, खुद नाचते हैं, अपने पालतु हाथी, घोड़े और ऊँटों को नचाते हैं, करतब दिखलाते हैं और किसी प्रकार का आग्रह नहीं रखते। मंदिर से जो मिल जाय, प्रसन्न हो जाते हैं। कई बुजुर्ग गौरव के साथ कहते हैं कि वे भी अपने किशोर और युवावस्था में रथ यात्रा में भगवान के बेवाण को ले जाते थे।

 


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DesertTimes.in

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