हम सबकों मिल सकती है पूर्णता

सभी स्त्री-पुरुष ईश्वर की यह कृपा प्राप्त कर सकते हैं, क्योंकि सभी स्त्री-पुरुषों के साथ ईश्वर की कृपा और करुणा निरंतर बनी हुई है। जिस प्रकार मनुष्यों के प्रति ईश्वर का कर्तव्य है, उसी प्रकार मनुष्यों का कर्त्तव्य भी ईश्वर के प्रति है। मनुष्यों को केवल वह कर्म करना है, जो ईश्वर को आनंद देता है। ईश्वर कभी भी पापी और पुण्यात्मा के बीच भेद नहीं करते। किसी के अंदर छिपी हुई भक्ति और जीवन को पवित्र और आध्यात्मिक बनाने की प्रबल शक्ति ही महत्वपूर्ण तत्व है। उसके बाद की सारी व्यवस्था ईश्वर स्वयं कर देते हैं। हमने पढ़ा है कि रत्नाकर और अंगुलिमाल जैसे भयानक अपराधी भी, जिन्होंने अपने जीवन में अनेक अपराध किए, बाद में भगवान के परम भक्त बन गए और सर्वोत्तम मनुष्य के रूप में प्रतिष्ठित हुए। जब इस प्रकार के कठोर अपराधी भी इतने अल्प समय में एक पवित्र आध्यात्मिक मनुष्य बन गए, तब कोई कारण नहीं है कि दूसरे लोग भी ईश्वर की यह कृपा प्राप्त न कर सकें।हम अभी जो कुछ हैं, वह हमारे पूर्व के विचारों और कर्मों का परिणाम है और भविष्य में हम जो कुछ होंगे, वह हमारे पूर्व के विचारों और कर्मों का परिणाम होगा। हमारे अतीत के कर्म ही हमारे वर्तमान को निर्धारित करते हैं और हमारे वर्तमान के विचार और कर्म ही हमारे भविष्य को निर्धारित करेंगे। कोई भी सांसारिक पदार्थ या मनुष्य हमारा स्थायी साथी या सम्बंधी नहीं है। यही कारण है कि बुद्धिमान मनुष्य मानते हैं कि ईश्वर की उपलब्धि ही मनुष्य जीवन का एकमात्र लक्ष्य है। जब मनुष्य सभी स्थूल सांसारिक पदार्थों से अपनी मानसिक वृत्तियों को वापस खींच लेता है और उसे ईश्वर की ओर मोड़ देता है, तब उसे अत्यंत आनंद की अनुभूति होती है। ईश्वर के प्रति गहन भावना की निरंतरता उसे आध्यात्मिक आनंद में विभोर कर देती है।

 

अगर ईश्वर चाहे तो वह तथाकथित पापी मनुष्य को भी क्षण भर में एक महान भक्त बना सकता है। अनेक दोषों और गलतियों के बावजूद भी मनुष्य दैवी प्राणी है। अपनी सारी कमियों के बावजूद वह भगवान का ही व्यक्त रूप है। प्रत्येक वस्तु ही दैवी सृष्टि है और सभी में एक दिन पूर्णता प्राप्त करने की सम्भावना है।

प्रत्येक साधक, चाहे उसका अतीत कितना भी मलिन और निंदनीय क्यों न रहा हो, वह आध्यात्मिक अनुभूति को पाने का अधिकारी है। जब साधक अपने चारों ओर दैवी वातावरण और उस स्रोत, जहां से दैवी अस्तित्व की तरंगे प्रसारित हो रही हैं, की अनुभूति करता है, तब आनंद-अनुभूति की दशा को ‘भाव’ कहते हैं। भाव का अतिरेक होने से भक्ति का प्रकाशन हृदय में ज्यादा होता है। जैसे बाढ़ के समय सारी नदियां, तालाब, झरने आदि पानी से भर जाते हैं और पानी ऊपर से बहने लगता है, वैसे ही भाव के अति प्रवाह से साधक का मन व हृदय भक्ति से आप्लावित हो जाते हैं।


correspondent

DesertTimes.in

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