शिव इसलिए बाघ के खाल पर विराजते हैं

हिंदू पुराणों में उल्लेख मिलता है कि भगवान विष्णु यानी श्रीहरि भगवान भोलेनाथ को एक अनोखा उपहार देना चाहते थे। और यह उपहार बिना नृसिंह अवतार लिए संभव नहीं था।

नृसिंह भगवान ने हिरण्यकशिपु का वध कर दिया लेकिन उनका क्रोध शांत नहीं हो रहा था। भयभीत कर देने वाले इस स्वरूप से नृसिंह भगवान संसार का अंत करने के लिए आतुर हो रहे थे। यह भगवान नृसिंह की एक लीला थी।

इस लीला से तीनों लोक भयभीत थे। ऐसी विषम परिस्थिति देख देवता और देवगण भोलेनाथ के पास पहुंचे। तब शिव ने अपने अंश से उत्पन्न वीरभद्र से कहा कि नृसिंह क्रोध में भरकर संसार को नष्ट करने की कोशिश कर रहे हैं। उन्हें उनके वास्तविक स्वरूप से अवगत कराएं, और उनसे निवेदन करो कि वह ऐसा न करें।

यदि वह आपका अनुरोध न मानें तो शक्ति का प्रयोग करके नृसिंह को शांत करो। वीरभद्र नृसिंह के पास पहुंचे और पहले विनित भाव से शांत करने की कोशिश करने लगे। लेकिन जब नृसिंह नहीं माने तब वीरभद्र ने शरभ रूप धारण लिया।

शरभ उपनिषद् में इस बात का विस्तार से उल्लेख मिलता है नृसिंह को वश में करने के लिए वीरभद्र गरूड़, सिंह और मनुष्य का मिश्रित रूप धारण करके प्रकट हुए और शरभ कहलाये।

शरभ ने नृसिंह को अपने पंजे से उठा लिया और चोंच से वार करने लगा। शरभ के वार से आहत होकर नृसिंह ने अपना शरीर त्यागने का निर्णय लिया और शिव से निवेदन किया कि इनके चर्म को शिव अपने आसन के रूप में स्वीकार करें।

इसके बाद नृसिंह भगवान विष्णु के तेज में मिल गये और शिव ने इनके चर्म को अपना आसन बना लिया। इसलिए शिव वाघ के खाल पर विराजते हैं।


correspondent

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